एक ही हाथ लेकर पैदा हुई थी। स्कूल जाने लगी तो दूसरे बच्चे रोज उसका मजाक उड़ाते। लगा कि उसका आत्मविश्वास और धैर्य जवाब दे जाएगा। एक हाथ न होना सामाजिक संघर्ष का रूप लेता जा रहा था। एक बार तो डर के मारे उसके पिता उसे रायपुर से करीब 120 किमी दूर बिलासपुर बीएससी करने जाने नहीं दे रहे थे। लेकिन, आज वहीं बिटिया बीएचयू में पीएचडी कर रही है। सिंधियों को जैविक तौर पर 5000 साल प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता से जोड़कर उसने एक नई पहचान दे दी है। उसने स्कूल-कॉलेज के साथ ही अपने धैर्य की भी परीक्षा पास कर ली।


बीएचयू के जंतु विज्ञान विभाग में जीन वैज्ञानिक प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे के मार्गदर्शन में पीएचडी कर रहीं चंचल देवनानी की मां मनीषा देवनानी ने भावनात्मक होकर ये बातें अमर उजाला से साझा कीं। मनीषा देवनानी ने कहा कि बेटी हमेशा से प्रोफेसर बनना चाहती थी। उसने इसे ही अपना लक्ष्य बनाया और मेहनत की।

यही वजह है कि न तो कभी उसका आत्मविश्वास कम हुआ और न ही उसने कभी हार मानी। अब तो वह सामान्य लोगों की तरह रहती है, जबकि हम लोगों ने कई बार उस पर आर्टिफिशियल हाथ लगवाने का दबाव डाला। लेकिन, चंचल ने इसे अस्वीकार कर वास्तविक स्थिति में रहने की बात कही। बीएचयू में भी पीएचडी करने आई तो जल्दी कोई प्रोफेसर उसे अपने अंडर में पीएचडी नहीं कराना चाह रहे थे क्योंकि उन्हें भी यह आशंका थी कि क्या वह कर पाएगी।

इसे भी पढ़ें; CM Yogi in Varanasi: VIP मार्ग और कार्यक्रम स्थल नो फ्लाई जोन, ड्रोन पर प्रतिबंध; भीड़ प्रबंधन पर विशेष जोर



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *