शहर के निजी अस्पतालों और क्लीनिकों में दवाओं की मोनोपोली यानी एकाधिकार का खेल इस समय चरम पर है। डॉक्टर और स्थानीय दवा निर्माता सॉल्ट में मामूली बदलाव करके नए नाम से दवा बनवाते हैं। ये दवाएं इन्हीं अस्पतालों के मेडिकल स्टोरों और कुछ चुनिंदा दुकानों पर ही मिलती हैं। 10 टैबलेट की जो स्ट्रिप महज 50 रुपये में मिलनी चाहिए, वह यहां पर 250 से 270 रुपये में धड़ल्ले से बेची जा रही है। ड्रग एक्ट की धज्जियां उड़ाकर ये अस्पताल-क्लीनिक मरीजों को सरेआम लूट रहे हैं।

संवाद न्यूज एजेंसी की टीम ने शहर के प्रमुख मेडिकल कॉलेजों, निजी क्लीनिकों, अस्पतालों और उनके बाहर स्थित मेडिकल स्टोरों का रियलिटी चेक किया तो ये चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। चिकित्सा संस्थानों के आसपास फैले दवा बाजार, स्वरूपनगर, काकादेव और सर्वोदयनगर स्थित निजी क्लीनिकों व अस्पतालों में मरीजों के साथ डर का कारोबार किया जा रहा है। आईसीयू में भर्ती रोगियों के लिए 10 से 15 हजार रुपये की दवाएं मंगाई जाती हैं जबकि बाहर वही दवा चार से पांच हजार रुपये में मिल सकती है।

इस पूरे गठजोड़ का सीधा असर उन गरीब व मध्यवर्गीय परिवारों पर पड़ रहा है जो ग्रामीण इलाकों से इलाज कराने कानपुर आते हैं। सामान्य वायरल या पेट दर्द के इलाज में 200 से 300 रुपये की जेनेरिक या प्रसिद्ध ब्रांडेड दवाओं से काम चल जाता है। मोनोपोली दवाओं के कारण यह खर्च 1200 से 1500 रुपये तक पहुंच रहा है। यदि मरीज किसी अन्य मेडिकल स्टोर पर जाता है तो दुकानदार पर्चा देखकर साफ कह देता है कि इस सॉल्ट की दवा नहीं है। मजबूरी में इन्हीं अस्पतालों और चुनिंदा मेडिकल स्टोरों से तीमारदार को दवा लेनी पड़ती है।



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