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भाजपा का झंडा (सांकेतिक तस्वीर)
– फोटो : ANI
विस्तार
आगामी विधानसभा चुनाव से पहले हुए विधान परिषद चुनाव के परिणामों ने भाजपा को झटका और सीख एक साथ दी है। स्नातक सीट पर जीत और शिक्षक सीट पर मिली हार ने साफ किया कि अगर आधी-अधूरी तैयारी के साथ कार्यकर्ताओं और मतदाताओं की उपेक्षा कर मनमाने प्रत्याशी उतारे, तो एमएलसी चुनाव सरीखे नतीजे देखने को मिल सकते हैं। पार्टी में अंदरखाने इस पर चर्चा शुरू हो गई है। दोनों ही चुनावों में जीत और हार के वास्तविक कारण खोजे जा रहे हैं, जिससे कमियों को दूरकर विधानसभा चुनाव में बेहतर परिणाम लाए जा सकें।
दरअसल, स्नातक और शिक्षक एमएलसी चुनाव विधानसभा चुनाव से इतर होते हैं। एमएलसी चुनाव में अमूमन जो प्रत्याशी ज्यादा वोट बनवाता है, उतना ही उसके जीतने की संभावना प्रबल होती है। प्रत्याशी कौन है, यह दूसरी बड़ी वजह होता है। वहीं, विधानसभा चुनाव में पार्टी कार्यकर्ता की सक्रियता, संगठन की बात मतदाताओं तक पहुंचना, प्रत्याशी कौन जैसे कई कारक काम करते हैं। भाजपा अपने ज्यादातर चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम-काम के बूते जीतने के गुमान में रहती रही है।

