जिस स्मारक को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने ताजमहल से दो साल पहले संरक्षित किया, अब उसके निशान तक नहीं बचे। खंदारी के पास मौजा मऊ में सिद्धार्थ एन्क्लेव में बादशाह अकबर के सलाहकार अबुल फजल और फैजी की बहन लाडली बेगम का मकबरा कागजों में दर्ज है। मौके पर अब केवल नीले रंग का केंद्रीय संरक्षित स्मारक का बोर्ड लगा है। मकबरे के अवशेषों पर पार्क बना दिया गया है, जहां स्मारक के नाम पर केवल नीले रंग का बोर्ड और नीचे पत्थर के टुकड़ों का प्लेटफॉर्म बाकी है।
वर्ष 1920 में एएसआई ने ताजमहल को संरक्षित किया था, लेकिन उससे दो साल पहले 23 अप्रैल 1918 को मौजा मऊ में लाडली बेगम का मकबरा संरक्षित किया गया। यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के केंद्रीय संरक्षित स्मारकों की सूची में 59वें नंबर पर लाडली बेगम के मकबरे के नाम से दर्ज है। ताज से पहले तामीर हुई यह धरोहर अब जमींदोज हो चुकी है। स्मारक के अवशेषों पर पार्क बना है, जिससे मकबरे की मौजूदगी का पता नहीं चलता। 108 साल में एएसआई ने यहां एक रुपये का संरक्षण कार्य यहां नहीं कराया।
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बना दिया गया पार्क
– फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
शेख सलीम चिश्ती के पोते इस्लाम खान की पत्नी थीं लाडली
मुगलकाल में शिक्षक शेख मुबारक की बेटी लाडली बेगम का निकाह शेख सलीम चिश्ती के पोते बंगाल के वायसराय इस्लाम खान से हुआ था। वह अकबर के नवरत्न रहे अबुल फजल और फैजी की बहन थीं। वर्ष 1595 में उनके भाई अबुल फजल ने उनके नाम पर बाग बनवाया था। 335 फीट लंबी और 4 फीट मोटी दीवारों से घिरे इस बाग के चारों कोनों पर मीनारें थीं। वर्ष 1608 में लाडली बेगम की मौत के बाद उन्हें यहीं दफनाया गया। वर्ष 1874 की एएसआई रिपोर्ट और 1896 की मु. लतीफ की पुस्तक में दर्ज है कि यहां 36×30 फीट के प्लेटफॉर्म पर अष्टकोणीय मकबरा बनाया गया था। जहां अबुल फजल और फैजी की संगमरमर से बनी कब्रें हैं। यहां अब कुछ नहीं बचा है।
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कुआं
– फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
बाग के गेट पर कुआं और सजावटी मंडप था मौजूद
मौजा मऊ मुस्तकिल तहसील सदर आगरा के राजस्व नक्शे में गाटा संख्या 919 में लाडली बेगम मकबरे के चिह्न मौजूद हैं। वर्ष 1608 में लाडली बेगम की मौत हुई, लेकिन उससे पहले वर्ष 1595 में उनके नाम पर बाग बनाया गया था। वर्ष 1990 तक यहां गेट, दीवारें और बाग नजर आता था और मौजूदा हाईवे की सड़क नजर आती थी। ब्रिटिश काल में मथुरा के सेठ लक्ष्मीचंद्र को अंग्रेजों ने इस मकबरे को बेच दिया था। उन्होंने इसके पत्थर निकालकर बेच दिए और लाल पत्थर से सजावटी मंडप का निर्माण कराया। गेट पर ही बड़ा कुआं था, जो अब नहीं है।
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एएसआई का लगा बोर्ड
– फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
एएसआई अधीक्षण पुरातत्वविद स्मिथा कुमार ने बताया कि कई वर्षों से यह स्मारक ऐसा ही है। इसके अवशेष ही बचे हैं, जिसकी सफाई का काम समय-समय पर कराया जाता है। इस स्मारक का निरीक्षण करके देखेंगे, इसे बचाने के लिए क्या किया जा सकता है।
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लाडली बेगम के मकबरे
– फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
एएसआई के पूर्व निदेशक पद्मश्री केके मुहम्मद ने बताया कि लाडली बेगम के मकबरे के अवशेषों को सहेजने की जरूरत है। यह स्मारक ताजमहल से पहले संरक्षित किया गया था तो इसकी उपयोगिता और महत्व समझा जा सकता है। इसकी मौजूदा हालत इतिहास को नष्ट करने जैसी है।