खूबसूरत ताजमहल की पहचान समेटे आगरा के दिल में बहते बदबूदार नाले अब सिर्फ गंदगी का जरिया नहीं, बल्कि आम लोगों के लिए धीमा जहर बन चुके हैं। इन खुले नालों के किनारों पर आबाद बस्तियों में 5 लाख से अधिक लोगों की सांस दुर्गंध से घुट रही है। हर लम्हा जान का खतरा बना हुआ है। हवा में घुलती असहनीय दुर्गंध न सिर्फ लोगों का सांस लेना दूभर कर रही है, बल्कि इन नालों से उठती जहरीली गैसें और लगातार पनपते बैक्टीरिया मासूम बच्चों से लेकर बुजुर्गों की सेहत बिगाड़ रहे हैं।
खुले पड़े बदबूदार नालों को ढकने के लिए अमर उजाला के अभियान को जनप्रतिनिधियों का समर्थन मिला है। नगर निगम पार्षदों ने खुलकर इन नालों को ढकने की आवाज बुलंद की है। पार्षदों का कहना है कि वह नगर निगम सदन में यह प्रस्ताव लेकर आएंगे कि सभी खुले हुए नालों को प्रीकास्ट स्लैब से ढका जाए ताकि बदबू के साथ लोगों की जान से बचाव हो सके।
नाला काजीपाड़ा:
डेढ़ किमी लंबा नाला, जिसके दोनों किनारों पर घर हैं। जूते की दस्तकारी का काम यहां होता है। बारिश में नाले का पानी 2 फीट तक घरों में घुस जाता है।
नाला लोहामंडी:
3 किमी लंबा नाला है। नाले से सटे घर बने हैं। कई जगह नाले की दीवार टूटी होने से बच्चों के गिरने के साथ कटान का खतरा है।
नाला मंटोला:
3 किमी लंबा नाला, जिसके पास जूते के कारखाने का काम होता है। कतरन डालने से नाले में केमिकल की दुर्गंध लोगों का दम घोंट रही है।
ये बोले पार्षद
पार्षद मो. शहजाद ने कहा कि मंटोला नाला करीब 20 फीट तक गहरा है। इसके दोनों किनारे पर लोग रहते हैं। नाला कई जगह टूटा भी है, जिसकी मरम्मत के साथ इस पर प्रीकास्ट स्लैब रखे जाएं या सीसी से कवर किया जाए।
काजीपाड़ा पार्षद मीना देवी का कहना है कि काजीपाड़ा नाले में गिरकर कई लोगों की जान जा चुकी है। जरा सी बारिश में सड़क और नाले के बीच का अंतर खत्म हो जाता है, जिससे हादसे हो रहे हैं। इसे ढकने के लिए प्रस्ताव लाएंगे।
पार्षद शरद चौहान ने बताया कि नालों की सफाई तलीझाड़ करने के बाद इन्हें प्री कास्ट से ढक दिया जाए ताकि कूड़ा करकट और चमड़े की कतरन न फेंकी जा सके। बदबू के कारण यहां रहना मुहाल है।
