
सूरकुटी
– फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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सूरकुटी
– फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
सूर-सूर तुलसी ससी, उड़गन केशवदास। अब के कवि खद्योत सम, जहां तहां करत प्रकास…। हिंदी साहित्य के आकाश में जिस महाकवि को सूर्य का दर्जा प्राप्त है, उनकी अपनी तपोस्थली रुनकता स्थित सूरकुटी गुमनामी और उपेक्षा के अंधेरे में है। महाकवि सूरदास की आज 548वीं जयंती है, लेकिन सूर सरोवर पक्षी विहार की बंदिशों और प्रशासनिक उदासीनता ने धरोहर को विकास की मुख्यधारा से काट दिया है।
रुनकता स्थित सूरकुटी में वर्ष 1971 में तत्कालीन राष्ट्रपति वीवी गिरी ने एक भव्य श्रीकृष्ण मंदिर का निर्माण कराया था। यह एकमात्र मंदिर है, जहां आराध्य भगवान श्रीकृष्ण के साथ उनके अनन्य भक्त सूरदास की प्रतिमा भी स्थापित है और दोनों की एक साथ पूजा होती है। यहां 1978 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और फिर 1980 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी आ चुके हैं। सूरदास मंदिर के दृष्टिबाधित महंत गोपाल बताते हैं कि 55 साल पुरानी तपोस्थली में वर्ष 2017 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आए तो हालात बदलने की उम्मीद थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।