लखनऊ। किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष सूर्यकांत के मुताबिक, अस्थमा से वैश्विक स्तर पर वार्षिक मृत्यु दर 13 फीसदी है, जबकि भारत में यह दर 43 फीसदी तक पहुंच जाती है, जो चिंताजनक है। इनहेलर चिकित्सा को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि इसमें दवा की कम मात्रा सीधे फेफड़ों तक पहुंचती है और दुष्प्रभाव भी कम होते हैं।
प्रो. सूर्यकांत ने बताया कि विश्व अस्थमा दिवस प्रति वर्ष मई के पहले मंगलवार को मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य अस्थमा की बीमारी और उसकी देखभाल के बारे में जागरूकता फैलाना है। इस वर्ष की थीम अस्थमा से पीड़ित हर व्यक्ति के लिए सूजन-रोधी इनहेलर की उपलब्धता – अब भी एक अत्यंत आवश्यक जरूरत है। देश में लगभग चार करोड़ लोग अस्थमा से पीड़ित हैं, जो गंभीर स्वास्थ्य चुनौती है।
अस्थमा आनुवंशिक रोग है, जिसमें श्वास नलिकाएं अतिसंवेदनशील हो जाती हैं। धूल, धुआं, नमी, मौसम परिवर्तन, सर्दी-जुकाम, धूम्रपान, फास्टफूड, तनाव, व्यायाम, पालतू जानवर और परागकण जैसे कारक नलिकाओं में सूजन पैदा करते हैं, जिससे सांस लेने में कठिनाई होती है।
इनहेलर के प्रकार और इनका उपयोग
अस्थमा के मरीज सामान्यतः दो प्रकार के इनहेलर का उपयोग करते हैं- सिकुड़न कम करने वाले और सूजन कम करने वाले। सूजन रोधी इनहेलर का नियमित उपयोग अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि श्वास नलिकाओं में पहले सूजन उत्पन्न होती है, जिसके बाद ही सिकुड़न विकसित होती है। भारत में अक्सर देखा जाता है कि सूजन रोधी इनहेलर के स्थान पर केवल सिकुड़न कम करने वाले इनहेलर का अधिक उपयोग होता है, जो दीर्घकाल में पर्याप्त नहीं है। अगर यदि सूजन रोधी इनहेलर का नियमित और निरंतर उपयोग किया जाए, तो अस्थमा अटैक की आशंका काफी हद तक कम की जा सकती है।
अस्थमा के लक्षण
रात में बढ़ने वाली खांसी, सांस लेने में कठिनाई के दौरे, छाती में कसाव या जकड़न और छाती से घरघराहट जैसी आवाजें। दो तिहाई रोगियों में दमा बचपन से ही प्रारंभ हो जाता है, जिसके लक्षणों में बार-बार खांसी आना, सांस फूलना और शारीरिक विकास में बाधा शामिल हैं।
बचाव और सावधानियां
धूल, धुआं, गर्दा, नमी और धूम्रपान से बचना चाहिए। बच्चों को रोयेंदार कपड़े न पहनाएं व रोयेंदार खिलौने खेलने को न दें। पंख या रेशम के तकिये का इस्तेमाल न करें। घर के अंदर फूलों वाले पौधे या ताजे फूल न रखें। रोगी एयरकंडीशन या कूलर के कमरे से एकदम गर्म हवा में बाहर न जाएं। इत्र, परफ्यूम या डिओडोरेंट का इस्तेमाल भी न करें। फास्टफूड, शीतलपेय तथा रासायनिक पदार्थों वाले खाद्य पदार्थों से परहेज करना चाहिए। सर्दी, जुकाम या फ्लू का तुरंत इलाज कराएं।
दौरे रोकने के उपाय
मौसम बदलने से चार से छह सप्ताह पहले ही सजग हो जाना चाहिए और उचित चिकित्सा परामर्श लेना चाहिए। इनहेलर व दवाएं विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार ही लेनी चाहिए। अपने फेफड़ों को मजबूत बनाने के लिए प्राणायाम जैसे सांस के व्यायाम करें। यदि बलगम गाढ़ा हो गया है, खांसी, घरघराहट और सांस लेने में तकलीफ बढ़ जाए या रिलीवर इनहेलर की जरूरत बढ़ गई हो तो तुरंत चिकित्सक से मिलें। घर हवादार और सीलन मुक्त होना चाहिए। घर की सफाई, पुताई व पेंट के समय रोगी को घर से बाहर रहना चाहिए। कुत्ता, बिल्ली, पक्षी न पालें, घर को कॉकरोचों आदि से मुक्त रखें।
