इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि निलंबन अवधि में काम पर उपस्थित न होने की स्थिति में कर्मचारी को उस अवधि का पूरा वेतन और अन्य सेवा लाभ पाने का अधिकार नहीं है। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति मंजूरानी चौहान की एकल पीठ ने मथुरा के सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक कांता प्रसाद की याचिका खारिज कर दी। कांता प्रसाद सरखंड खेड़ा स्थित प्राथमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापक के पद पर कार्यरत थे। 10 फरवरी 1992 को जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने उन्हें निलंबित कर दिया था। आरोप था कि उन्होंने विद्यालय का चार्ज अपने उत्तराधिकारी को नहीं सौंपा और कैश बुक, पासबुक, चेक बुक जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज अपने पास रखे।
मामले में बलदेव थाने में लोक सेवक की ओर विश्वासघात करने के आरोप में एफआईआर दर्ज कराई गई। वर्ष 1997 में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, मथुरा ने उन्हें दोषी ठहराते हुए एक साल की सजा सुनाई। कांता प्रसाद 30 जून 2000 को सेवानिवृत्ति के बाद वेतन, पेंशन और अन्य लाभों के लिए बीएसए को प्रत्यावेदन दिया। उनके प्रत्यावेदन को खारिज कर दिया गया। इसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए याचिका दायर की।
हाईकोर्ट ने पाया कि कांता प्रसाद न तो स्थानांतरण के बाद निर्धारित स्थान पर उपस्थित हुए और न ही विभागीय जांच में सहयोग किए। यह भी साबित नहीं किए कि वह कार्य पर लौटने के इच्छुक थे, लेकिन विभाग ने उन्हें काम करने से रोका। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में ‘काम नहीं तो वेतन नहीं’ का सिद्धांत लागू होगा। ऐसे में याची को निलंबन अवधि का वेतन, भत्ते और पेंशन संबंधी लाभ पाने का अधिकार नहीं है। इसी के साथ कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।