उरई। शहर से सटे ग्राम लहरियापुर में करीब 450 करोड़ की 7.26 एकड़ नजूल जमीन को निजी संपत्ति में बदलने की कोशिश की परतें अब दस्तावेजों की जांच के साथ खुलने लगी हैं। जांच में सबसे बड़ा सवाल वर्ष 1953 में तैयार की गई लीज डीड पर उठ रहा है। जिस पद सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया इन काउंसिल के अधिकारी के हस्ताक्षर इस डीड पर बताए जा रहे हैं, वह पद देश की आजादी के बाद ही समाप्त हो चुका था। इसके बावजूद इसी दस्तावेज को आधार बनाकर सरकारी जमीन पर करीब 73 साल तक कब्जा बनाए रखा गया।

डीएम की जांच में सामने आए दस्तावेज बताते हैं कि जमीन की कहानी ब्रिटिश शासनकाल से शुरू होती है। 15 मार्च 1914 को एके प्रसन्ना के नाम पर गाटा संख्या 518 की जमीन को 99 वर्ष के लिए आवासीय उपयोग के लिए लीज पर दिया गया था। यानी मूल रिकॉर्ड में जमीन की स्थिति शुरू से ही नजूल भूमि के रूप में दर्ज थी। इसके बाद जमीन के हस्तांतरण में एक के बाद एक ऐसे मोड़ आए, जिन पर अब सवाल खड़े हो रहे हैं। (संवाद)

1918 में बिना कलक्टर की अनुमति कर दिया जमीन का हस्तांतरण

जांच के मुताबिक वर्ष 1918 में एके प्रसन्ना की पुत्री एलिस ने बिना कलक्टर की अनुमति के जमीन बॉयज क्रिश्चियन होम, पुणे के नाम विक्रय कर दी। नजूल भूमि के हस्तांतरण के लिए आवश्यक अनुमति नहीं ली गई। इस कारण यह हस्तांतरण नियम विरुद्ध माना गया। इसके बाद भी जमीन के स्वामित्व और कब्जे का सिलसिला यहीं नहीं रुका।

1953 में आजादी के बाद फिर हुआ हस्तांतरण

इसके बाद बॉयज क्रिश्चियन होम, पुणे की ओर से 15 मार्च 1953 को एडलीन ग्रिगर के नाम जमीन हस्तांतरित किए जाने की बात जांच में सामने आई है। यह हस्तांतरण भी नियमों के विपरीत पाया गया लेकिन सबसे गंभीर सवाल इसके साथ तैयार की गई दूसरी लीज डीड को लेकर है।

जिस पद का अस्तित्व ही नहीं था, उसी के नाम से तैयार हुई लीज

जांच में सामने आया कि इसी दौरान सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया इन काउंसिल के हस्ताक्षर के सहारे एक और लीज डीड तैयार की गई। जबकि इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट, 1947 लागू होने के बाद ब्रिटिश शासन की यह व्यवस्था समाप्त हो चुकी थी। ऐसे में वर्ष 1953 में इस पद के नाम से दस्तावेज तैयार होना ही जांच का सबसे अहम बिंदु बन गया है। यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि जमीन का हस्तांतरण नियमों के मुताबिक हुआ या नहीं, बल्कि यह भी है कि 1953 में ऐसे पद के नाम से लीज डीड आखिर तैयार कैसे हुई, जब उस पद का अस्तित्व ही समाप्त हो चुका था। इसी दस्तावेज को बाद के वर्षों में जमीन पर अधिकार का आधार बनाया जाता रहा।

73 साल तक सरकारी जमीन बनी रही बंधक

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि संदिग्ध दस्तावेज के बावजूद जमीन पर कब्जा दशकों तक बना रहा। 1953 से 2026 तक करीब 73 वर्षों में कई स्तरों पर सरकारी रिकॉर्ड और जमीन की स्थिति की जांच का मौका आया, लेकिन लीज डीड में मौजूद इस मूल विसंगति की गहराई तक जाने की कोशिश नहीं हुई। इस दौरान शिकायतें भी हुईं। बावजूद इसके करीब 450 करोड़ रुपये कीमत की सरकारी संपत्ति निजी कब्जे से बाहर नहीं निकल सकी। अब डीएम की जांच के बाद वर्षों पुराने दस्तावेजों की वैधता पर सवाल खड़े हो गए हैं।

1914 में दर्ज लीज, 1953 की डीड का रिकॉर्ड कहां

जांच में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है। कलक्टर कार्यालय के नजूल रजिस्टर में जमीन की लीज 15 मार्च 1914 की दर्ज है, जबकि 1953 की कथित नई लीज डीड का तत्कालीन कलक्टर डीके भट्टाचार्य के हस्ताक्षर से तैयार कर किया गया जिसकी पुष्टि अभिलेखों से नहीं हुई एवं उसी तरह का कोई भी रिकॉर्ड नजूल रजिस्टर में भी नहीं मिलता। इतना ही नहीं नगर पालिका के संपत्ति रजिस्टर में भी 1953 की लीज डीड का रिकॉर्ड में नहीं पाया गया। यही अंतर अब पूरे मामले की जांच का अहम आधार बन गया है। सवाल है कि यदि 1953 में नई लीज डीड वास्तव में वैध रूप से तैयार हुई थी तो उसका रिकॉर्ड संबंधित सरकारी रजिस्टरों में क्यों नहीं मिला। इससे स्पष्ट हैं की उक्त डीड फर्जी तौर पर तैयार कर भूमि हड़पने की कार्यवाही की गई ।

2014 में ही खत्म हो चुकी थी 99 साल की लीज

मूल दस्तावेज के अनुसार वर्ष 1914 में दी गई 99 साल की लीज वर्ष 2014 में समाप्त हो चुकी थी। ऐसे में 2014 के बाद जमीन पर किसी निजी व्यक्ति या संस्था का कब्जा किस आधार पर जारी रहा, यह भी जांच का बड़ा सवाल है। डीएम की जांच के आधार पर जमीन को अब राज्य संपत्ति घोषित किए जाने की कार्रवाई की गई है। साथ ही फर्जी और कूटरचित दस्तावेजों के सहारे सरकारी संपत्ति को निजी बनाने के प्रयास को लेकर पुलिस में मामला भी दर्ज कराया गया है।

अब 73 साल पुराने दस्तावेजों की टाइमलाइन जांच का सवाल

पूरे मामले में अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि 1953 की कथित लीज डीड किसने तैयार की, उसमें तत्कालीन पदाधिकारी के हस्ताक्षर किस आधार पर इस्तेमाल हुए, दस्तावेज सरकारी अभिलेखों में कैसे आया और इतने वर्षों तक इसे वैध मानकर जमीन पर कब्जा कैसे चलता रहा।

यदि जांच में यह दस्तावेज कूटरचित पाया जाता है तो मामला केवल जमीन पर अवैध कब्जे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी अभिलेखों में संदिग्ध दस्तावेज के इस्तेमाल और उसके आधार पर करोड़ों की संपत्ति पर दशकों तक कब्जा बनाए रखने की पूरी कड़ी भी जांच के दायरे में आएगी। यही 73 साल पुरानी लीज अब 450 करोड़ की सरकारी जमीन के कथित फर्जीवाड़े की सबसे अहम कड़ी बन गई है।

वर्जन

नजूल रजिस्टर में सिर्फ 1914 की लीज डीड का ही रिकॉर्ड दर्ज है। इसके बाद के अंतरण के कोई अभिलेखीय साक्ष्य जांच एवं सुनवाई में नहीं पाए गए। गठित समिति की जांच में फर्जी अभिलेखों के एवं बिना सक्षम स्तर से अनुमति के भूमि हड़पने की आपराधिक साजिश सामने आई है, इसलिए नगर पालिका की ओर से प्राथमिकी दर्ज कराई गई है। उक्त नजूल भूमि राज्य की संपत्ति है और अब से पुनः शासकीय स्वामित्व एवं प्रबंधन में ले ली गई है।

– राजेश कुमार पांडेय, डीएम



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