– जरा याद करो कुर्बानी का लोगो लगाएं

मनोज कुमार

लुहारी। झांसी का थोना लुहारी गांव स्वतंत्रता आंदोलन के संघर्ष और बलिदान का गवाह रहा है। आठ फरवरी 1939 को यहां अंग्रेजी शासन के खिलाफ तिरंगा फहराने निकले निहत्थे सत्याग्रहियों पर अंग्रेजी हुकूमत ने अंधाधुंध गोलीबारी कर दी थी। इसमें कई सत्याग्रही शहीद हुए थे, जबकि अनेक गंभीर रूप से घायल हो गए थे। ग्रामीणों की मांग है कि गोलीकांड स्थल पर शहीद स्थल बनाया जाए और शहीदों की स्मृति में थोना लुहारी गोलीकांड शहीद स्मृति द्वार का निर्माण कराया जाए।

अंग्रेजों की ओर से बर्बरता से चलाई गईं गोलियों से सत्याग्रही दीवान सिंह लुहारी, जवार कोरी, दम्मू लाल, गोपाल दास, मुन्नालाल, भगवान दास यादव, बेनी प्रसाद गुप्ता सहित कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे। ग्रामीणों के अनुसार कुछ घायलों की स्थिति इतनी गंभीर थी कि वे जीवनभर चल नहीं सके। भगवान दास यादव के सिर में गोली लगने से उनकी खोपड़ी तक अलग हो गई थी। स्वतंत्रता के इस आंदोलन से जुड़े लोगों के संघर्ष और साहस की कहानी आज भी गांव में सुनाई जाती है। (संवाद)

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क्रांतिकारियों के अज्ञातवास का गवाह रहा गांव

क्रांतिकारियों के अज्ञातवास का भी गांव गवाह रहा है। पूर्व ब्लॉक प्रमुख राजेंद्र सिंह बताते हैं कि आजादी की लड़ाई में पुरुषों के साथ महिलाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। उन्होंने बताया कि चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह सहित कई क्रांतिकारी अज्ञातवास के दौरान इस क्षेत्र में रहे थे। यहां स्वतंत्रता आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए कई रणनीतियां भी बनाई गईं। ग्रामीण महिलाओं ने क्रांतिकारियों तक भोजन और जरूरत का सामान पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आजादी की लड़ाई में थोना लुहारी और आसपास के गांवों के लोगों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। पुरुषों के साथ महिलाओं ने भी क्रांतिकारियों की मदद की।

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आजादी की दीवानगी से नाम हो गया दीवान सिंह

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दीवान सिंह लुहारी के पुत्र इंद्रपाल सिंह ने बताया कि उनके पिता का वास्तविक नाम सरदार सिंह था। आजादी के आंदोलन में तन-मन-धन से समर्पित होने के कारण लोग उन्हें आजादी का दीवाना कहा जाने लगा था, जिससे उनका नाम दीवान सिंह पड़ गया। इंद्रपाल सिंह ने बताया कि गोलीकांड के दिन सत्याग्रही अंग्रेजी दफ्तरों से अंग्रेजी हुकूमत का झंडा उतारकर तिरंगा फहरा रहे थे। तभी लाठीचार्ज के बाद गोली चला दी गई। गोली लगने के बाद अंग्रेज दीवान सिंह को मरा हुआ समझकर छोड़ गए थे। साथियों ने उन्हें मऊरानीपुर अस्पताल पहुंचाया, जहां उपचार के बाद उन्हें चरखारी जेल भेज दिया गया। जेल में उन्होंने बहुत यातनाएं दी गईं थीं। ग्रामीणों को मलाल है कि जिस धरती पर सत्याग्रहियों का खून बहा, वहां आज तक शहीद स्मारक नहीं बन सका है। इसके अलावा थोना लुहारी गोलीकांड शहीद स्मृति द्वार का निर्माण भी कराया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और बलिदान को याद रख सकें।



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