लखनऊ। तीन-चार दिन से छत पर बैठे हैं। गैस खत्म हो गई है, पीने का पानी भी नहीं बचा। सड़क तक राहत आती है, घर तक नहीं। लोहरामऊ में नाव से पहुंची अमर उजाला टीम से पहली मंजिल की बालकनी से राजीव कश्यप ने यह दर्द साझा किया। यह हाल सिर्फ एक परिवार का नहीं, लोहरामऊ, फैजुल्लागंज और दाउदनगर के कई घरों का है, जहां जिंदगी कई दिनों से पानी में फंसी है।
बृहस्पतिवार को इन इलाकों में तीन-चार फीट तक पानी भरा मिला। गलियां डूब चुकी हैं और कई परिवार छतों व बालकनियों में सिमटे हैं। घरों में चूल्हे बंद हैं। पीने के पानी और भोजन की किल्लत है। जरूरत पड़ने पर नाव ही सहारा है लेकिन कई लोगों का आरोप है कि नाव समय पर नहीं पहुंच रही।
चूल्हे बंद, राहत का इंतजार
राजीव कश्यप के घर में पानी भरने से खाना बनाना मुश्किल है। प्रशासन से एक बार खाद्य किट मिली, इसके बाद स्वयंसेवी संगठनों और आसपास की कॉलोनियों से कभी-कभार भोजन पहुंच रहा है। परिवारों की चिंता बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों को लेकर ज्यादा है। दवा खत्म होने पर क्या होगा, बीमार व्यक्ति को कैसे अस्पताल ले जाएंगे और रात में अचानक कोई जरूरत पड़ गई तो बाहर कैसे निकलेंगे, यह सवाल उनके जेहन में कौंध रहे हैं।
तीन-चार फीट पानी में डूबा आलीशान मकान
टीम को एक घर के अंदर तक नाव पहुंची मिली। वहां दो महिलाएं नाव पर सामान लाद रहीं थीं। पूछने पर रोली सिंह ने बताया कि 10 दिन से परेशान हैं। शुरुआती दिनों में परिवार के बाहर गए सदस्यों को मौर्या मार्केट के पास राहत शिविर में बैठे अधिकारी अंदर नहीं आने दे रहे थे। बच्चों की पढ़ाई बंद है। घर का सामान पानी में डूबकर खराब हो रहा है। उनका आरोप था कि सड़क के आसपास भोजन-पानी बांटा जा रहा है लेकिन अंदर पानी से घिरे परिवारों तक राहत पहुंचाना मुश्किल है। संतारी, राजेश यादव समेत अन्य प्रभावितों ने भी इसी तरह की परेशानी बताई।
तीन मंजिला छत पर बैठे आदिल की नजर नाव पर
अपने तीन मंजिला मकान की छत पर बैठे आदिल ने बताया कि वह चार दिन से फंसे हैं। बाहर निकलना चाहते हैं। नीचे उतरने का रास्ता पानी में डूबा है। छत पर बैठे आदिल बार-बार सड़क की तरफ देखते रहे। बोले- जो भी नाव आती है उसका नाविक वापस आकर ले जाने की बात कहता है लेकिन लौटकर नहीं आता। प्रशासन का कोई अधिकारी भी सुध लेने नहीं पहुंचा है।
दो घंटे नाव का इंतजार, फिर कमर तक पानी में सफर
असगर अली, अजीम और परिवार की दो महिलाएं लाठी के सहारे पानी में आगे बढ़ती मिलीं। उन्होंने बताया कि सरकारी नाव के लिए करीब दो घंटे इंतजार किया लेकिन नाव नहीं मिली। इसके बाद मजबूरी में डेढ़ से दो किलोमीटर कमर तक गंदे पानी में चलकर जाना पड़ा। महिलाओं के साथ इस तरह पानी पार करना जोखिम भरा है। कहीं सड़क है, कहीं गड्ढा, इसका पता पानी के भीतर नहीं चलता।
घर में सांप, बाहर गंदा पानी और चारों तरफ खतरा
बाढ़ प्रभावित क्षेत्र के कई परिवारों ने बताया कि उनके घरों में सांप दिखाई दे चुके हैं। कई दिनों से जमा पानी में दुर्गंध और मच्छरों का प्रकोप बढ़ रहा है। बिजली के उपकरण और घरेलू सामान खराब हो रहे हैं। बच्चों और बुजुर्गों को पानी से निकालना परिवारों के लिए सबसे बड़ी चिंता है। रात में परेशानी और बढ़ जाती है। अंधेरे में पानी के भीतर रास्ता दिखाई नहीं देता। किसी तरह दिन तो कट जाता लेकिन रात काटना मुश्किल हो रहा है।
राहत कैंप में अधिकारी, कैमरे पर जवाब नहीं
मौर्या मार्केट के पास नगर निगम के बाढ़ राहत कैंप में एसडीएम, तहसीलदार और राजस्व निरीक्षक मिले। कैमरे के सामने अधिकारियों ने जानकारी देने से इन्कार किया। हालांकि, अनौपचारिक बातचीत में बताया कि बृहस्पतिवार को 140 राशन किट, 600 भोजन पैकेट और 40 पेटी पानी वितरित किया गया। उनके इस आंकड़े को भी सच मान लिया जाए तो वह भी प्रभावितों की दिक्कत व उनकी संख्या को देखते हुए ऊंट के मुंह में जीरा के समान है।
किराये का ट्रैक्टर-ट्राॅली कर सामान निकाल रहे पीड़ित
मौर्या मार्केट राहत कैंप के पास चौबे डेरी निवासी रमन मिश्रा ने बताया कि घर में पानी भर जाने के बाद वह ऊंचे स्थान पर किराये का मकान लेकर वहां रह रहे हैं। वह चाहते थे कि उनकी जरूरत का कुछ सामान निकालकर वहां पहुंचवा दिया जाए लेकिन प्रशासन अंदर जाना ही नहीं चाहता। लिहाजा खुद किराये का ट्रैक्टर-ट्रॉली कर सामान निकाल रहे हैं। इसी कॉलोनी की निधि शुक्ला भी अपना बिस्तर, कपड़े, अनाज और दूसरे जरूरी सामान पानी से बचाकर ट्रैक्टर-ट्रॉली से निकालकर प्रीतिनगर में किराये के मकान में ले जा रहीं थीं।

फैजुल्लागंज क्षेत्र की कॉलोनियों में भरा तीन से चार फीट तक पानी।

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