Modern Shravan Kumar की एक ऐसी प्रेरणादायक तस्वीर कांवड़ यात्रा 2026 के दौरान Muzaffarnagar में देखने को मिली, जिसने हजारों श्रद्धालुओं का दिल जीत लिया। पवित्र श्रावण माह में चल रही कांवड़ यात्रा के बीच शहर के प्रसिद्ध शिव चौक पर उस समय श्रद्धा, सेवा और भारतीय संस्कृति का अद्भुत संगम दिखाई दिया, जब हापुड़ निवासी शिवभक्त प्रशांत राणा अपनी 80 वर्षीय दादी शारदा देवी को विशेष रूप से तैयार की गई कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार से गंगाजल लेकर अपने गंतव्य की ओर बढ़ते नजर आए।
यह दृश्य देखते ही वहां मौजूद श्रद्धालुओं की भीड़ ठहर गई। हर कोई इस अनोखी कांवड़ को देखने और अपने मोबाइल कैमरे में कैद करने के लिए उत्सुक दिखाई दिया। कई लोगों ने प्रशांत राणा को आधुनिक युग का ‘श्रवण कुमार’ बताते हुए उनके सेवा भाव और समर्पण की मुक्त कंठ से सराहना की।
शिव चौक पर पहुंचते ही आकर्षण का बना केंद्र बनी ‘श्रवण कांवड़’
श्रावण मास में मुजफ्फरनगर से होकर गुजरने वाली लाखों कांवड़ों के बीच प्रशांत राणा की यह विशेष कांवड़ अलग ही पहचान बना रही थी। जैसे ही उनकी कांवड़ शहर के शिव चौक पहुंची, श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ पड़ा।
लोगों ने न केवल इस अनूठी यात्रा को देखा बल्कि प्रशांत और उनकी दादी का उत्साहवर्धन भी किया। कई श्रद्धालु उनके साथ तस्वीरें लेते और उनके सेवा भाव की प्रशंसा करते नजर आए। पूरे मार्ग पर “बोल बम” और “हर हर महादेव” के जयघोष के बीच यह दृश्य भारतीय संस्कृति के उस स्वरूप को जीवंत कर रहा था, जिसमें बुजुर्गों की सेवा को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।
90 किलो से अधिक भार उठाकर निभा रहे सेवा और भक्ति का संकल्प
प्रशांत राणा की यह यात्रा केवल आस्था का नहीं बल्कि शारीरिक धैर्य, मानसिक दृढ़ता और सेवा भावना का भी उदाहरण है।
उन्होंने बताया कि उनकी दादी शारदा देवी का वजन लगभग 45 किलोग्राम है। कांवड़ का संतुलन बनाए रखने के लिए दूसरे पलड़े में भी लगभग 45 किलोग्राम वजन रखा गया है, जिसमें गंगाजल, कलश और अन्य पूजा सामग्री शामिल है।
इस प्रकार प्रशांत अपने कंधों पर 90 किलोग्राम से अधिक भार लेकर लगातार यात्रा कर रहे हैं। इतनी कठिन यात्रा के बावजूद उनके चेहरे पर थकान नहीं बल्कि भगवान शिव के प्रति अटूट श्रद्धा और अपनी दादी की सेवा का संतोष स्पष्ट दिखाई देता है।
‘महादेव से कोई निजी इच्छा नहीं, बस दादी की खुशी सबसे बड़ी पूजा’
यात्रा के दौरान प्रशांत राणा ने भावुक होकर बताया कि उन्होंने यह कांवड़ किसी व्यक्तिगत इच्छा या मनोकामना की पूर्ति के लिए नहीं उठाई है।
उन्होंने कहा कि उनका एकमात्र उद्देश्य अपनी दादी को हरिद्वार ले जाकर मां गंगा के पवित्र दर्शन कराना और उन्हें स्वयं कांवड़ यात्रा का अनुभव कराना था।
प्रशांत ने कहा कि भगवान शिव से उनकी केवल एक ही प्रार्थना है कि उनकी दादी को दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और सुखी जीवन का आशीर्वाद मिले।
उनके इस सरल और भावनात्मक संदेश ने वहां उपस्थित श्रद्धालुओं को भी भावुक कर दिया।
22 शिवभक्तों की टोली में सबसे अलग दिखी यह अनोखी कांवड़
प्रशांत राणा ने बताया कि उनके साथ कुल 22 शिवभक्तों की टोली यात्रा कर रही है।
हालांकि सभी श्रद्धालु पारंपरिक कांवड़ लेकर चल रहे हैं, लेकिन उनकी ‘श्रवण कांवड़’ पूरे मार्ग में लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
जहां-जहां से यह टोली गुजर रही है, वहां लोग रुककर इस अनोखी कांवड़ को देख रहे हैं और प्रशांत के सेवा भाव की सराहना कर रहे हैं।
दादी शारदा देवी बोलीं— बुजुर्गों की सेवा ही सबसे बड़ी पूजा
पोते के इस समर्पण से भावुक हुईं शारदा देवी ने कहा कि आज के समय में युवाओं के लिए अपने माता-पिता और बुजुर्गों का सम्मान करना ही सबसे बड़ी पूजा है।
उन्होंने कहा कि जीवन में सबसे बड़ा धन माता-पिता और बड़ों का आशीर्वाद होता है। जिस प्रकार प्रशांत ने उन्हें सम्मान दिया है, वह केवल उनके परिवार का नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति और संस्कारों का भी सम्मान है।
उन्होंने अपने पोते के उज्ज्वल भविष्य और स्वस्थ जीवन के लिए भगवान शिव से प्रार्थना भी की।
श्रवण कुमार की कथा की याद दिला गया यह दृश्य
प्रशांत राणा की यह यात्रा लोगों को भारतीय संस्कृति में वर्णित श्रवण कुमार की उस प्रेरणादायक कथा की याद दिला रही है, जिसमें उन्होंने अपने माता-पिता को कंधों पर बैठाकर तीर्थ यात्रा कराई थी।
आज के आधुनिक दौर में जहां भागदौड़ भरी जिंदगी के कारण पारिवारिक रिश्तों पर अक्सर चर्चा होती है, वहीं प्रशांत राणा का यह प्रयास समाज के सामने सेवा, सम्मान और संस्कार की एक जीवंत मिसाल बनकर उभरा है।
कांवड़ यात्रा केवल आस्था नहीं, सेवा और संस्कार का भी संदेश
श्रावण मास में निकलने वाली कांवड़ यात्रा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं मानी जाती, बल्कि यह अनुशासन, सेवा, त्याग और सामाजिक समरसता का भी संदेश देती है।
प्रशांत राणा की यह अनूठी यात्रा इसी भावना को और अधिक सशक्त करती दिखाई दी। उनके इस प्रयास ने यह संदेश दिया कि धार्मिक आस्था के साथ यदि परिवार के बुजुर्गों का सम्मान और सेवा जुड़ जाए, तो उसका महत्व और भी बढ़ जाता है।
मुजफ्फरनगर में श्रद्धालुओं ने की जमकर सराहना
शिव चौक पर मौजूद श्रद्धालुओं ने प्रशांत राणा का उत्साह बढ़ाते हुए उन्हें आधुनिक युग का सच्चा ‘श्रवण कुमार’ बताया। कई लोगों ने कहा कि ऐसे उदाहरण समाज को सकारात्मक दिशा देने का कार्य करते हैं और नई पीढ़ी को अपने बुजुर्गों के प्रति सम्मान और जिम्मेदारी का संदेश देते हैं।
श्रद्धालुओं ने भगवान शिव से प्रशांत राणा और उनकी दादी शारदा देवी के उत्तम स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और सुरक्षित यात्रा की कामना भी की।
सनातन संस्कृति का जीवंत संदेश बनी यह कांवड़ यात्रा
कांवड़ यात्रा 2026 के दौरान हापुड़ के शिवभक्त प्रशांत राणा द्वारा अपनी 80 वर्षीय दादी को कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार से गंगाजल लाने का यह दृश्य केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों और सेवा भाव का प्रेरणादायक उदाहरण बनकर सामने आया। यह यात्रा बताती है कि आधुनिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच भी यदि परिवार, संस्कार और बुजुर्गों के प्रति सम्मान जीवित रहे, तो वही भारतीय परंपरा की सबसे बड़ी पहचान है।
विशेष: हापुड़ निवासी शिवभक्त प्रशांत राणा अपनी 80 वर्षीय दादी शारदा देवी को विशेष कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार से गंगाजल लेकर आ रहे हैं। लगभग 90 किलोग्राम से अधिक भार के साथ पूरी की जा रही यह यात्रा श्रद्धा, सेवा, पारिवारिक संस्कार और सनातन परंपरा का प्रेरणादायक उदाहरण बनकर कांवड़ यात्रा 2026 में श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
