प्रदेश में स्वास्थ्य विभाग ने एईएस (एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम) और जेई (जापानी इंसेफेलाइटिस) पर बड़ी हद तक नियंत्रण पाने का दावा किया है। इस साल अब तक इन दोनों बीमारियों से एक भी मरीज की मौत नहीं हुई है। यानी केस फैटेलिटी रेट (सीएफआर) शून्य हो गया है। कुछ जगहों पर मरीज मिले भी हैं, लेकिन समय पर इलाज मिलने से वे ठीक हो गए।

प्रदेश में राष्ट्रीय वेक्ट बॉर्न डिजीज नियंत्रण कार्यक्रम के जरिए एईएस और जेई को पूरी तरह से खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार वर्ष 2017 तक एईएस और जेई से बड़ी संख्या में मौतें होती थीं। 

उस समय एईएस का सीएफआर 13.9 प्रतिशत और जेई का 13.4 प्रतिशत था। लगातार निगरानी, समय पर जांच और इलाज की बेहतर व्यवस्था से अब इन बीमारियों पर करीब 95 प्रतिशत तक नियंत्रण पा लिया गया है।

वर्ष 2023 में एईएस के 300 मरीज मिले थे और सीएफआर 0.6 प्रतिशत था जबकि 2025 में यह संख्या करीब 150 रह गई। इस साल अब तक सिर्फ 35 मरीज मिले हैं। वहीं, जेई के 2025 में 10 मरीज मिले थे, जबकि इस साल अब तक केवल तीन मामले सामने आए हैं। 

वहीं, दोनों बीमारियों में सीएफआर शून्य हो गया है। अब स्वास्थ्य विभाग एईएस-जेई नियंत्रण के गोरखपुर मॉडल को न सिर्फ अन्य मंडलों में अपनाया जा रहा है बल्कि दस्तक अभियान में मलेरिया, टीबी, कुष्ठरोग सहित अन्य बीमारियों को भी शामिल कर लिया गया है।

 



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