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अनारकली, 450 साल पहले मुगलिया दौर का ऐसा रहस्यमय किरदार जिसे इतिहास ने मान्यता नहीं दी, लेकिन लैला-मजनूं, रोमियो-जूलियट की तरह सलीम-अनारकली के बीच मुहब्बत के किस्से-कहानियों में यह लगातार बनी रही। इसी काल्पनिक किरदार से जुड़ा आगरा के किले में सेना के कब्जे वाले हिस्से की ओर अनारकली का अहाता मौजूद है। यहां नीले रंग का बोर्ड लगा है, जिस पर अनारकली का अहाता दर्ज है। मुगलिया दौर की यह इमारत पूरी तरह से खंडहर हो चुकी है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इसका अब संरक्षण कराएगा।
आगरा के किले में दिल्ली गेट की ओर से प्रवेश करने पर बीरबल हाउस से आगे अनारकली का अहाता है। सेना के कब्जे वाले किले में अनारकली का अहाता चर्चित है, लेकिन एएसआई इस नाम को मान्यता नहीं देता। हालांकि मुगलिया दौर की इस इमारत के खंडहर होने पर इसका संरक्षण जरूर किया जा रहा है। लाल पत्थर और ककैया ईंटों के साथ इस भवन में संगमरमर का उपयोग किया गया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने संरक्षण के लिए वार्षिक संरक्षण योजना दिल्ली भेजी है, जिसमें पहले चरण में 60 लाख रुपये खर्च होने हैं।
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अनारकली का अहाता
– फोटो : अमर उजाला
मुसम्मन बुर्ज जैसा फव्वारा
अनारकली का अहाता में मुसम्मन बुर्ज और खासमहल की तरह संगमरमर से तामीर शानदार फव्वारा इसकी वास्तुकला को बयां कर रहा है। यह किस वर्ष बना, इसका कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। महल की जगह सेना के कब्जे वाले हिस्से में बीरबल हाउस के पास इसकी मौजूदगी पर कई सवाल उठ सकते हैं, लेकिन इसकी वास्तुकला पूरी तरह से महल से प्रेरित है। संगमरमर पर की गई नक्काशी वाला फव्वारा अब भी सुरक्षित है, जिसकी पच्चीकारी के पत्थर जरूर निकल गए हैं।
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अनारकली का अहाता
– फोटो : अमर उजाला
लाहौर में है अनारकली का मकबरा
ता कयामत शुक्र गोयम करदगरे ख्वाहिश रा
आह गर मन बज़ बीम रुये यारे ख्वाहिश रा
यानी काश मैं अपने प्रियतम का चेहरा एक बार फिर देख पाता, मैं क़यामत के दिन तक अपने ईश्वर का आभारी रहता। लाहौर में अनारकली के मकबरे के प्रवेश द्वार पर संगमरमर से यह इबारत शहंशाह जहांगीर ने लिखवाई है। वर्ष 1599 में अनारकली, जिसे नादिरा बेगम और शर्फुन्निसा का नाम दिया गया। मुगलिया इतिहास में अनारकली का काल्पनिक किरदार माना गया, लेकिन सबसे पहले वर्ष 1611 में एक अंग्रेज यात्री विलियम फिंच ने इसे दर्ज किया।
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अनारकली का अहाता
– फोटो : अमर उजाला
उसके पांच साल बाद एक अन्य अंग्रेज यात्री एडवर्ड टेरी ने इस कहानी को दोहराया। वर्ष 1884 में कन्हैया लाल ने अपनी पुस्तक तारीख-ए-लाहौर में अनारकली की कहानी बयां की। इस पर सबसे पहले वर्ष 1928 में लव ऑफ अ मुगल प्रिंस फिल्म बनी, जिसके बाद 1953 में सी. रामचंद्र की फिल्म अनारकली और फिर 1960 में फिल्म मुगल-ए-आजम ने अनारकली और सलीम की कहानी को अमर कर दिया।
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अनारकली का अहाता
– फोटो : अमर उजाला
अधीक्षण पुरातत्वविद स्मिथा कुमार ने बताया कि सेना के कब्जे में मौजूद अहाता के संरक्षण का काम शुरू किया जाएगा। इसकी वार्षिक संरक्षण योजना दिल्ली भेजी गई है। मंजूरी के बाद काम शुरू किया जाएगा।