हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सेवा मामले में दिए एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्यवाही में आरोप सिद्ध करने के लिए विभाग को मौखिक साक्ष्य पेश करना अनिवार्य है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल दस्तावेजों के आधार पर, बिना नियमित मौखिक जांच और गवाहों के परीक्षण के किसी कर्मचारी को दंडित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने ऐसी कार्रवाई को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और उप्र सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली के प्रावधानों के विपरीत बताया।

न्यायमूर्ति करुणेश सिंह पवार ने यह आदेश तत्कालीन एसडीएम मोहनलालगंज संतोष कुमार सिंह की याचिका स्वीकार करते हुए पारित किया। याचिकाकर्ता की ओर से न्यायालय को बताया गया कि जांच अधिकारी ने न तो मौखिक सुनवाई की, न किसी गवाह का बयान दर्ज किया और न ही जिरह का अवसर दिया। पूरी विभागीय जांच केवल अभिलेखों के आधार पर पूरी कर ली गई थी।

राजस्व परिषद ने अपनी राय में कहा था कि याचिकाकर्ता ने आवश्यक सतर्कता बरती थी और अनियमितताओं की जानकारी मिलते ही सुधारात्मक कदम उठाए थे। परिषद ने यह भी माना था कि उनके खिलाफ किसी दुर्भावना का कोई प्रमाण नहीं है, लेकिन इस रिपोर्ट पर उचित विचार नहीं किया गया।

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पाया कि विभागीय जांच में न तो सुनवाई की तिथि, समय और स्थान निर्धारित किया गया और न ही आरोपों को सिद्ध करने के लिए विभाग ने कोई मौखिक साक्ष्य पेश किया। अदालत ने माना कि ऐसी जांच विधिसम्मत नहीं कही जा सकती और इस आधार पर विभागीय दंडादेश को कानून के अनुरूप नहीं ठहराया जा सकता।

ये है मामला: मामला वर्ष 2019 का है। ग्राम भसंडा में आवासीय पट्टों के आवंटन में कथित अनियमितताओं के आरोप में संतोष के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू की गई थी। जांच के बाद राज्य सरकार ने सितंबर 2025 में उनकी एक वार्षिक वेतनवृद्धि स्थायी रूप से रोकने और निंदा प्रविष्टि देने का दंड दिया था। इसके विरुद्ध दायर प्रत्यावेदन को भी दिसंबर 2025 में खारिज कर दिया था।



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