डॉ. भीमराव आंबेडकर के नाम पर राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों के बीच कार्यक्रम करने की होड़ मची हुई है, लेकिन उनकी शिक्षाओं व मान्यताओं का प्रचार-प्रसार उतना ही कमजोर होता जा रहा है। बाबा साहब जातियों के उन्मूलन और सामाजिक समरसता व समानता के पक्षधर थे, पर हमारे समाज में यही विषमताएं बढ़ती जा रही हैं। दरअसल, आंबेडकर के बहाने असली निशाना वोट बैंक ही है।
भाजपा, सपा और बसपा डॉ. आंबेडकर को याद करने में कोई भी पीछे नहीं है। बाबा साहब के बताए रास्ते पर चलने के सबके अपने-अपने दावे हैं। डॉ. आंबेडकर का प्रसिद्ध कथन है- जाति का उन्मूलन तभी संभव है जब शास्त्रों की सत्ता को नकारा जाए। आंबेडकर ने जाति उन्मूलन के लिए अंतरजातीय विवाह को सबसे प्रभावी उपाय माना। वे कहते थे कि जब विभिन्न जातियों के लोग आपस में विवाह करेंगे, तो जातीय भेदभाव स्वतः समाप्त हो जाएगा। लेकिन, हमारे समाज में आज भी अंतरजातीय विवाह खून-खराबे तक की स्थिति ला देते हैं।
आंबेडकर के अनुसार, केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है। अगर समाज में ऊंच नीच बनी रहती है, तो स्वतंत्रता का कोई वास्तविक अर्थ नहीं रह जाता। लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग में प्रो. संजय गुप्ता कहते हैं कि डॉ. आंबेडकर की शिक्षाओं को मानते तो आज समाज से ऊंच नीच का भाव पूरी तरह से समाप्त हो जाता। आंबेडकर का मानना था कि जाति व्यवस्था केवल सामाजिक प्रथा नहीं है, बल्कि इसका आधार धर्मग्रंथों में निहित है। उन्होंने कहा कि जब तक लोग इन ग्रंथों को अंतिम सत्य मानते रहेंगे, तब तक जाति समाप्त नहीं हो सकती।
