इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लापता बेटे के पिता के आचरण पर हैरानी जताते हुए हत्या में दो युवकों को मिली उम्रकैद की सजा रद्द कर दी। कोर्ट ने कहा कि उस पिता के बयान पर यकीन नहीं होता, जिसका बेटा गुमशुदा हो और वह रात में चैन की नींद लेने के बाद सुबह चाय की चुस्की ले। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने आगरा के कबीर खान और इरशाद की अपील स्वीकार करते हुए की। दोनों को आगरा की सत्र अदालत ने 2013 में लापता हुए 12 वर्षीय प्रिंस की हत्या का दोषी मानते हुए 2020 में उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

मामला शाहगंज थाना क्षेत्र का है। रसूलपुर, सराय ख्वाजा निवासी प्रिंस के पिता सर्वेश कुमार शर्मा ने अंतिम बार देखे जाने के आधार पर इरशाद के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई। आरोप लगाया कि पांच नवंबर की शाम सात बजे वह छोटे बेटे प्रिंस को घर से बुलाकर ले गया था। घर नहीं लौटने पर रात भर बेटे की तलाश की पर वह नहीं मिला। दूसरे दिन सुबह करीब सात बजे घर के बाहर से शोर सुनाई दिया। बाहर देखा तो घर के सामने कूड़े के ढेर पर रस्सी से बंधा बेटा पड़ा था। सीने के नीचे का हिस्सा जल चुका था।

पुलिस ने मामले की विवेचना के दौरान कबीर खान को भी आरोपी बनाया। ट्रायल के दौरान अभियोजन के पेश हुए आठ गवाहों के बयान पर उन्हें हत्या और सुबूत मिटाने के लिए उम्रकैद की सजा सुनाई। इसके खिलाफ दोनों ने हाईकोर्ट का रुख किया।

कोर्ट ने कई गवाहों के बयानों में विरोधाभास पाया लेकिन पिता के बयान व आचरण से कोर्ट हैरान हुई। कोर्ट ने पाया कि पिता ने बयान में कहा कि बेटे की तलाश में वह रात भर भटका। इरशाद के घर गया, जब वह नहीं मिला तो घर लौटकर सो गया। सुबह जब वह घर में चाय पी रहा था तभी घर के बाहर लोगों का शोर सुनकर बाहर निकला तो देखा कि बेटे का शव कूड़े के ढेर पर अधजली अवस्था में था। वहां पुलिस भी मौजूद थी।

कोर्ट ने कहा कि यह अविश्वसनीय है कि बेटा रात भर लापता था। खोजने पर नहीं मिला तो पिता घर आकर चैन से सो गया। सुबह साढ़े छह बजे तक पुलिस को इत्तला किए बिना घर में बेफिक्र चाय की चुस्की लेता रहा। कोर्ट ने पिता के इस आचरण पर निष्कर्ष निकाला कि पिता ने मनगढ़ंत कहानी रची।

अपीलार्थियों की दलील

अधिवक्ता ने दलील दी कि अपीलार्थियों को घर से पूछताछ के लिए उठाकर झूठा फंसाया गया है। इनके खिलाफ कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष सुबूत नहीं है। झूठ को बल देने के लिए आखिरी बार साथ देखे जाने की कहानी गढ़ी गई। यह सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।

कोर्ट की टिप्पणी

मौजूदा मामले में अभियोजन अंतिम बार साथ देखे जाने के सिद्धांत व हत्या के मकसद को साबित करने में विफल रहा। सुबूतों की शृंखला अधूरी हो तो केवल अनुमानों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता- हाईकोर्ट



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