यह महज ईंट-पत्थरों का ढेर भर नहीं है, बल्कि 500 साल से जिंदा विरासत का कत्ल है, जमीन पर जिसकी टूटी हुई ईंटें नहीं, बल्कि इतिहास बिखरा है। 30 साल के अंदर एक-एक करके दीवारें और गुंबद दरकते चले गए और अब इसका नामोनिशां ही मिट गया। लोदी काल की पहली मस्जिद, जिसे 25 साल पहले सहेजने के प्रयास किए गए थे लेकिन परवान नहीं चढ़ सके। अब तीन में से दो गुंबद गिरने के बाद पर्यटन से जुड़े लोगों ने इसे बचाने की गुहार लगाई है।
सिकंदरा में होली पब्लिक स्कूल के सामने 500 साल पुरानी लोदी काल की पहली मस्जिद का नामोनिशान मिटने के कगार पर है। साल 2001-02 में एएसआई के तत्कालीन अधीक्षण पुरातत्वविद केके मुहम्मद ने इसकी मरम्मत के लिए अडॉप्ट हेरिटेज स्कीम में रखा था। उनके तबादले के बाद इसका संरक्षण ही नहीं किया गया। तब यहां तत्कालीन संरक्षण सहायक डॉ. आरके दीक्षित ने निरीक्षण कर इस धरोहर को बचाने के लिए काम का ब्योरा भी दिया था। आईटीसी होटल ग्रुप ने इसके संरक्षण के लगे रुचि दिखाई थी।
2013 की तस्वीर में दीवारें कमजोर, दरारें बढ़ीं
13 साल पहले वर्ष 2013 की तस्वीर में लोदी मस्जिद की उपेक्षा नजर आने लगी थी। गुंबदों पर उगी झाड़ियां और कमजोर दीवारें दिखाई देने लगी थीं। दीवारों में दरारें स्पष्ट दिखने लगीं, लेकिन संरक्षण तब भी शुरू न किया गया। इस मस्जिद में साल 2010 में तीन दिन तक नमाज पढ़ने के नाम पर विवाद हुआ था। तत्कालीन सांसद के नेतृत्व में विरोध किया गया। इस पर यहां नमाज अदा करने से लोगों को रोक दिया गया।
सल्तनत और मुगलकाल को जोड़ती है वास्तुकला
आगरा अप्रूव्ड गाइड एसोसिएशन अध्यक्ष शमशुद्दीन के मुताबिक लोदी काल की मस्जिद को बचाने की जरूरत है। 500 साल पुराने आगरा के इतिहास और सल्तनत काल से मुगलकाल को जोड़ने वाली वास्तुकला समझने के लिए उसका संरक्षण होना ही चाहिए। टूरिज्म गिल्ड के पूर्व अध्यक्ष राजीव सक्सेना के मुताबिक पुरातत्व के लिए काम कर रहे एनजीओ को आगे आकर इसे बचाना चाहिए। केवल ताज और यूनेस्को धरोहरों के लिए एनजीओ योजना लाते हैं, असलियत में ऐसी धरोहर बचाने की कोशिश की जाए। गाइड एसोसिएशन के ही ताहिरउद्दीन ताहिर ने कहा कि इसे धार्मिक नजरिये से देखने की जगह सांस्कृतिक और पुरातत्व धरोहर मानते हुए बचाया जाए।