फर्जी वाहन नंबर और कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर फास्टैग बनवाकर टोल राजस्व को करोड़ों रुपये की चपत लगाने के मामले में जांच का दायरा बढ़ गया है। एसटीएफ की जांच में अब तक 142 वाहन चिह्नित किए गए हैं, जो फर्जीवाड़े के जरिये इटौंजा टोल प्लाजा से सैकड़ों बार गुजरे। मामले में कुछ टोलकर्मियों और अधिकारियों की भूमिका भी संदिग्ध मानी जा रही है।
आरटीओ ने तीन अप्रैल 2026 को सरोजनीनगर थाने में एफआईआर दर्ज कराई थी। बाद में मामले की विवेचना एसटीएफ को सौंप दी गई। एसटीएफ ने तीन दिन पहले चालक मुनीश को गिरफ्तार किया। इससे पहले ट्रक मालिक रियाज, उसके भाई सिराज और इंडसइंड बैंक के दो एजेंटों को भी गिरफ्तार किया जा चुका है।
एसटीएफ ने डीवीआर, सर्वर और अन्य दस्तावेज कब्जे में लिए
जांच के दौरान एसटीएफ ने इटौंजा टोल प्लाजा के सीसीटीवी फुटेज, वाहनों के गुजरने का विवरण और अन्य डाटा मांगा था, लेकिन लखनऊ-सीतापुर एक्सप्रेसवे प्रालि की ओर से अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। करीब छह महीने तक डाटा उपलब्ध न कराए जाने के बाद एसटीएफ ने कोर्ट की अनुमति से मंगलवार को टोल प्लाजा पर छापा मारकर डीवीआर, सर्वर और अन्य दस्तावेज कब्जे में लिए।
सूत्रों के मुताबिक, जांच में कुछ ऐसे साक्ष्य मिले हैं, जिनसे टोल एजेंसी के कर्मचारियों और अधिकारियों की संभावित भूमिका की पड़ताल की जा रही है। एसटीएफ को आशंका है कि मिलीभगत के कारण ही सीसीटीवी फुटेज और वाहनों से संबंधित डाटा उपलब्ध कराने में देरी हुई। हालांकि इसकी पुष्टि विस्तृत जांच और बरामद साक्ष्यों के विश्लेषण के बाद ही होगी।
रिकवर कराया जा रहा डाटा
एसटीएफ को एक जनवरी से तीन अप्रैल 2026 तक का डाटा चाहिए। इससे फर्जी फास्टैग वाले वाहनों के टोल से गुजरने की संख्या और राजस्व नुकसान का वास्तविक आकलन हो सकेगा। डीवीआर और सर्वर से पुराना डाटा रिकवर कराया जा रहा है। फर्जी नंबरों के कारण संबंधित वाहन मालिकों और चालकों को ट्रेस करना भी चुनौती बना हुआ है।
एनएचएआई अधिकारी भी पहुंचे
कोर्ट की अनुमति के बाद कार्रवाई होने पर मंगलवार को एनएचएआई का एक अधिकारी एसटीएफ के पास पहुंचा और मामले में एनएचएआई की ओर से अपना पक्ष रखा। जांच एजेंसी अब बरामद डाटा और दस्तावेजों के आधार पर आगे की कार्रवाई करेगी।
