हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने मंगलवार को राज्य सरकार के उस रुख पर असंतोष जताया जिसमें अंबेडकर नगर, कन्नौज, सहारनपुर और जालौन के मेडिकल कॉलेजों में निर्धारित आरक्षण सीमा से अधिक एससी उम्मीदवारों को एमबीबीएस में प्रवेश दिया जा रहा है। अदालत ने चिकित्सा स्वास्थ्य विभाग की प्रमुख सचिव वी. हेकली झिमोमी, चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक नेहा शर्मा और समाज कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव को संबंधित अभिलेखों के साथ बुधवार को फिर से तलब किया है । ये अधिकारी मंगलवार को अदालत में पेश हुए थे। चिकित्सा शिक्षा विभाग के कुछ अभिलेख पेश किए गए हैं जिन्हें अदालत ने अपने पास रख लिया है।
न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ल की खंडपीठ ने राज्य सरकार की ओर से दायर एक विशेष अपील की सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि सरकार को 14 अक्तूबर तक न्यायालय को यह भी सूचित करना चाहिए कि प्रश्नगत चार कॉलेजों में 16 सितंबर 2026 तक एमबीबीएस पाठ्यक्रम में आरक्षित श्रेणी के कितने उम्मीदवारों को प्रवेश दिया गया था और उसके बाद उनमें से कितनों को प्रवेश दिया गया है।
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अदालत ने पाया कि राज्य ने पिछले वर्ष यह आश्वासन दिया था कि शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण) अधिनियम, 2006 के प्रावधानों का पालन इन मेडिकल कॉलेजों में 2026-27 के शैक्षणिक सत्र से किया जाएगा। हालांकि, ऐसा प्रतीत होता है कि निर्धारित आरक्षण सीमा से अधिक प्रवेश फिर से दिए जा रहे हैं।
2006 के अधिनियम के तहत, अनुसूचित जातियों के लिए 21%, अनुसूचित जनजातियों के लिए 2% और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27% आरक्षण निर्धारित किया गया है जिससे कुल आरक्षण 50% हो जाता है। पीठ ने पाया कि राज्य सरकार, न्यायिक आदेशों का पालन न करने को उचित नहीं ठहरा सकती। अगली सुनवाई 14 अक्तूबर को होगी।