इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपराधिक अपीलों में पेपर बुक उपलब्ध नहीं होने का हवाला देकर बार-बार सुनवाई टालने की मांग पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की कार्यप्रणाली से न केवल अदालत का समय बर्बाद हो रहा है बल्कि जजों को न्यायिक कामकाज के बजाय पूछताछ काउंटर के क्लर्क की तरह काम करना पड़ रहा है। सुनवाई से पहले यह पता लगाना पड़ रहा है कि पेपर बुक तैयार हुई या नहीं।

यह तल्ख टिप्पणी न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय और न्यायमूर्ति पदम नारायण मिश्रा की खंडपीठ ने 2023 की दो आपराधिक अपीलों की सुनवाई के दौरान की। कोर्ट ने कहा कि सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करीब 80 प्रतिशत आपराधिक अपीलों में अपीलकर्ताओं के वकील पेपर बुक नहीं मिलने या उसके तैयार होने की जानकारी नहीं होने का हवाला देकर स्थगन मांगते हैं।

मामले में दोनों अपीलें 21 जुलाई को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध थीं। तब तक उनके पेपर बुक तैयार हो चुके थे। पांच अगस्त को सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता के अधिवक्ता ने पेपर बुक नहीं मिलने की बात कहते हुए स्थगन मांगा। कोर्ट ने बताया कि पेपर बुक 21 जुलाई को ही तैयार हो गया था। इस पर अधिवक्ता ने कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी।

खंडपीठ ने कहा कि वह इस पहलू पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं कर रही है, लेकिन पेपर बुक तैयार होने की जानकारी न होने की दलील सुनवाई टालने का महज बहाना प्रतीत होती है। कई आपराधिक अपीलों में पेपर बुक तीन-चार साल पहले तैयार हो चुकी होती हैं, फिर भी बाद में उनके उपलब्ध न होने का हवाला दिया जाता है।

कोर्ट ने हाईकोर्ट प्रशासन को सुझाव दिया कि हर सप्ताह उन आपराधिक अपीलों की सूची वेबसाइट या अन्य उचित माध्यम से प्रकाशित की जाए, जिनकी पेपर बुक तैयार हो चुकी हैं। वकीलों को पेपर बुक प्राप्त करने के लिए पर्याप्त समय देने के बाद ही इन मामलों को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए। कोर्ट ने कहा कि इस व्यवस्था से अदालत अपीलों का गुण-दोष के आधार पर फैसला कर सकेगी और अदालत के समय की भारी बर्बादी को रोका जा सकेगा।



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