रानी लक्ष्मीबाई की गौरवगाथा में डाकू सागर सिंह का नाम भी स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। रानी ने न केवल उसे क्षमा किया, बल्कि उसकी वीरता और देशभक्ति से प्रभावित होकर अपनी सेना में शामिल किया। बाद में सागर सिंह ने अंतिम सांस तक रानी का साथ निभाते हुए अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी और वीरगति प्राप्त की। रानी लक्ष्मीबाई किसी भी व्यक्ति की जाति, धर्म या अतीत से अधिक उसकी वीरता, निष्ठा और मातृभूमि के प्रति समर्पण को महत्व देती थीं। यही कारण था कि उन्होंने सागर सिंह को ‘कुंवर’ की उपाधि से भी सम्मानित किया था।

रानी लक्ष्मीबाई के शासनकाल में सागर सिंह (संग्राम सिंह) का नाम खतरनाक डाकू के रूप में जाना जाता था। कहा जाता है कि वह केवल अंग्रेजों और उनके समर्थक जमींदारों को ही निशाना बनाता था, क्योंकि अंग्रेजों ने उसके पूर्वजों की रियासत छीन ली थी। समय के साथ उसकी गतिविधियां झांसी राज्य की सीमाओं तक बढ़ने लगीं। उसे पकड़ने के कई प्रयास हुए, लेकिन सफलता नहीं मिली। अंततः रानी लक्ष्मीबाई ने स्वयं उसे पकड़ने का निर्णय लिया।

रानी ने दी थी  ‘कुंवर’ की उपाधि

सैन्य टुकड़ी के साथ रानी बेतवा के जंगलों में पहुंचीं और अपने कुशल रणकौशल से सागर सिंह के गिरोह को चारों ओर से घेर लिया। खुद को घिरता देख सागर सिंह ने उफनती बेतवा नदी में छलांग लगा दी। रानी ने भी बिना देर किए घोड़े समेत नदी में छलांग लगा दी। उनका साहस देखकर सैनिक भी नदी में उतर पड़े और सागर सिंह को जीवित पकड़ लिया गया।

इसके बाद उसे झांसी दरबार में पेश किया गया। वहां सागर सिंह ने बताया कि वह केवल अंग्रेजों और उनके सहयोगियों को लूटता है तथा लूटे गए धन का बड़ा हिस्सा गरीबों की मदद में खर्च करता है। उसकी निडरता और देशभक्ति से प्रभावित होकर रानी ने उसके अपराध क्षमा कर दिए और उसे अपनी सेना में शामिल कर लिया। कई अवसरों पर सागर सिंह ने अपने साहस और निष्ठा से रानी के इस निर्णय को सही साबित किया। इससे प्रसन्न होकर रानी ने उसे ‘कुंवर’ की उपाधि प्रदान की।

सागर सिंह के रहते सागर गेट के अंदर नहीं आ पाए थे अंग्रेज

सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी एवं इतिहासकार डॉ. पी.के. अग्रवाल बताते हैं कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान रानी ने सागर सिंह की तैनाती सागर गेट पर की थी। झांसी के भीषण युद्ध में परकोटे के कई द्वार एक-एक कर अंग्रेजों के कब्जे में चले गए, लेकिन सागर गेट पर तैनात सागर सिंह और उनके सैनिकों ने अंग्रेजी सेना को लंबे समय तक रोके रखा। अंग्रेज इस द्वार से झांसी में प्रवेश करने का साहस नहीं जुटा सके। अंततः युद्ध लड़ते हुए सागर सिंह वीरगति को प्राप्त हुए और आखिरी सांस तक रानी लक्ष्मीबाई के विश्वास तथा अपने देशप्रेम को निभाते रहे।

 



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