राम मंदिर में दान राशि में हेराफेरी प्रकरण की जांच ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका संबंध केवल धनराशि की सुरक्षा से नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की पारदर्शिता से है। जांच में सामने आए तथ्यों के अनुसार दानपात्रों से निकाली गई रकम का एक हिस्सा कथित रूप से लंबे समय तक व्यवस्था की निगाहों से बचकर बाहर जाता रहा। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह उठ रहा है कि जिस स्थान पर करोड़ों रुपये के चढ़ावे की गणना होती है, वहां मौजूद सुरक्षा और निगरानी तंत्र इस गतिविधि को पकड़ क्यों नहीं सके।




धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी बड़े मंदिर में केवल सीसीटीवी कैमरे लगा देना पारदर्शिता का प्रमाण नहीं माना जाता। महत्वपूर्ण यह होता है कि निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है, उसका ऑडिट कैसे होता है और क्या उसकी जानकारी समय-समय पर सार्वजनिक की जाती है। यदि दान गणना स्थल से धनराशि बाहर जाने के आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत स्तर की चूक नहीं, बल्कि पूरी निगरानी प्रणाली की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े करता है। एक बड़ा सवाल यह भी है कि यदि रकम कई बार बाहर गई, तो क्या दान गणना कक्ष, निकासी मार्ग, सुरक्षा जांच और रिकॉर्ड मिलान की प्रक्रिया में कहीं न कहीं कमी रही।



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