राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला पुलिस को भी पहले दिन से पता था। ट्रस्ट के पदाधिकारियों के साथ मिलकर पुलिस रकम बरामद करवाने में मदद कर रही थी। इसका खुलासा सीसीटीवी फुटेज से ही हुआ है, जिसमें पुलिसकर्मी अविनाश शुक्ला को गाड़ी में बैठाते कैद हुए हैं। साथ में एक बैग है, जिसमें बरामद रकम बताई जा रही है। हकीकत में पुलिस भी वही कर रही थी, जो ट्रस्ट के पदाधिकारी कह रहे थे। इसलिए सवालों के जवाब में सिर्फ पुलिस की चुप्पी थी।

छह जून को चढ़ावा चोरी का मामला मीडिया में आया था। जब मामले ने तूल पकड़ा और ट्रस्टी सवालों से घिरे, तब एसआईटी गठन की मांग हुई। एसआईटी की प्रारंभिक जांच के बाद 23 जून को केस दर्ज किया गया। एफआईआर होने से पहले तक कोई भी पुलिस अधिकारी कुछ भी बोलने को तैयार नहीं था। हर किसी का जवाब था कि पुलिस का कोई हस्तक्षेप नहीं है, क्योंकि कोई शिकायत नहीं मिली है। लेकिन दो दिन पहले एक सीसीटीवी फुटेज सामने आया, जिसमें कुछ लोग अविनाश शुक्ला के घर जाकर उसको कार में बैठाते नजर आ रहे हैं। साथ में एक काले रंग का बैग भी बरामद किया गया था। इस फुटेज में पुलिसकर्मी भी दिख रहे हैं। यह फुटेज पांच जून का है। स्पष्ट है कि पुलिस को पहले से जानकारी तो थी ही, वह संदिग्धों को पकड़ने व रकम बरामद करने में मदद कर रही थी।

ट्रस्ट के पदाधिकारियों का था दबाव

ट्रस्ट के पदाधिकारी चंपत राय, अनिल मिश्रा व अन्य तमाम लोग मामला दबाने में जुटे थे। उनकी मंशा थी कि रकम बरामद कर ली जाए और फिर मामला रफादफा कर दिया जाए। इसलिए पहले केस दर्ज नहीं कराया। लेकिन, पुलिस की मदद से अधिकारियों की तरह काम करते हुए ये पदाधिकारी छानबीन में खुद ही जुटे थे। सूत्रों के मुताबिक, पुलिस भी इन पदाधिकारियों के दबाव में थी, इसलिए चुप्पी साधे थी। जैसा निर्देश ये पदाधिकारी कर रहे थे, वह वैसा ही करते जा रहे थे।

पूछताछ करने में भी हिचक रहे पुलिसकर्मी

चंपत राय से लेकर मंदिर प्रबंधन से जुड़े पदाधिकारियों की पहुंच काफी ऊपर तक है। अमूमन पुलिस-प्रशासन के अधिकारी भी उनसे बातचीत करने में दबाव में रहते हैं। सूत्रों के मुताबिक, चंपत राय से जब पूछताछ की जानी थी, तो पुलिसकर्मी हिचक रहे थे। बहुत सख्ती से पूछताछ नहीं कर पाए। पूछताछ जरूर की, लेकिन एक तरह से बयान ही लिए। अब देखना होगा कि क्या किसी बड़े जिम्मेदार पर पुलिस नकेल कस पाएगी।

 



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