यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में ‘मुखिया पर भारी लिपिक’ की कहानी। इसके अलावा ‘सांसे थामकर दी गई विदाई’ और ‘मर्ज का इलाज नहीं, मरीज को ही मार दो’ के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी…
मुखिया पर भारी लिपिक
सेहत से जुड़े निजी कॉलेजों और संस्थानों में इन दिनों जांच चल रही है। जांच टीम की रिपोर्ट के आधार पर ही उनको मान्यता दी जाएगी। मान्यता के खेल में एक लिपिक की भूमिका संदिग्ध मिली। इसकी भनक लगते ही मुखिया ने उसे दूसरे स्थान पर भेज दिया लेकिन लिपिक चालाक निकला। वह दूसरे स्थान पर काम करने के बजाय छुट्टी पर चला गया। अब चर्चा है कि वह कॉलेज चलाने वालों को मान्यता लेने का सलीका सिखा रहा है। देखना यह है कि उसके सलीके से कितने लोग वैतरणी पार करते हैं क्योंकि छींटे तो मुखिया ही नहीं, मान्यता देने की प्रक्रिया से जुड़े हर अफसर पर पड़ना तय है।
सांसें थामकर दी गई विदाई
प्रदेश में तबादला सीजन की आखिरी घड़ी भी आ गई है। 31 मई तबादले की आखिरी तिथि है लेकिन कई विभागों में अभी बोहनी तक नहीं हुई है। छोटे के साथ-साथ बड़े अधिकारी भी इसके इंतजार में हैं। पढ़ाई-लिखाई वाले विभाग में बड़े साहब की विदाई पार्टी भी हो गई लेकिन उनके उत्तराधिकारी का आदेश ही नहीं आया। ऐसे में दावेदारों समेत अन्य अधिकारियों ने भी सांसें थामकर विदाई दी। पता नहीं कल कौन कुर्सी पर बैठेगा, विदाई पार्टी में मुख्य चर्चा का विषय भी यही रहा।
मर्ज का इलाज नहीं, मरीज को ही मार दो
कानपुर जोन के एक जिले में पुलिस कप्तान ने गजब का फरमान दे दिया है। दरअसल एक सीओ साहब ने शांति की बैठक में अशांति की बात खुलेआम की। सीओ साहब के बिगड़े बोल का वीडियो वायरल हो गया। कप्तान तक वीडियो पहुंचा तो उन्होंने किसी भी तरह की बैठक या उनके ऑफिस में फोन लाने पर ही पाबंदी लगाने का फरमान सुना दिया। इस रवैये से ऐसा लग रहा है, जैसे मर्ज का इलाज करने के बजाय मरीज को ही मार दिया।
