इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि मां की शारीरिक स्वायत्तता के साथ-साथ गर्भ में पल रहे अजन्मे बच्चे को भी जीने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। ऐसे में पति-पत्नी के बीच सामान्य अनबन के आधार पर गर्भ में पल रहे बच्चे को समाप्त करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति जेजे मुनीर व न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने गर्भपात की मांग में पत्नी की ओर से दायर याचिका खारिज कर दी। भदोही निवासी 24 वर्षीय युवती का विवाह मई 2026 में यूपी पुलिस के एक सिपाही से हुआ था। महिला ने पति, ससुरालवालों पर शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना सहित कई आरोप लगाते हुए गर्भपात की अनुमति देने की मांग में याचिका दायर की थी।

महिला का कहना था कि अब वह बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती है। यह भी कहा कि वह बेरोजगार है और आर्थिक तंगी के चलते बच्चे का पालन नहीं कर पाएगी। इसलिए उसे 20 सप्ताह के इस गर्भ को समाप्त करने की अनुमति दी जाए। वहीं, सिपाही पति ने पत्नी के आरोप को खारिज कर दिया। उसने कोर्ट के सामने हलफनामा दिया कि वह अपनी पत्नी और आने वाले बच्चे की पूरी जिम्मेदारी उठाने के लिए पूरी तरह तैयार है।



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