इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि भरण पोषण खैरात नहीं, पत्नी और बच्चों का अधिकार है। उन्हें पति और पिता के समान स्तरीय सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार है। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति जेके उपाध्याय की एकल पीठ ने इटावा निवासी पुलिस कांस्टेबल की पत्नी और बेटे की ओर से भरण पोषण की राशि बढ़ाने की मांग वाली पुनरीक्षण याचिका स्वीकार कर ली। साथ ही पत्नी का भरण-पोषण पांच हजार रुपये से बढ़ाकर आठ हजार तो बेटे का चार हजार से पांच हजार रुपये प्रतिमाह कर दिया है।

याची की शादी 29 नवंबर 2011 को हुई थी। आरोप है कि शादी के बाद ससुरालवालों ने अतिरिक्त दहेज की मांग की। मांग पूरी न होने पर उसे प्रताड़ित किया गया। 22 मार्च 2013 को उसे छोटे बच्चे के साथ घर से निकाल दिया गया। परिवार न्यायालय ने एक जून 2017 को पत्नी को तीन हजार और बेटे को एक हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था।

लगातार बढ़ते खर्चे के कारण पत्नी ने भरण पोषण की राशि बढ़ाने की मांग की। इस पर परिवार न्यायालय ने 2023 में पत्नी का भरण-पोषण पांच हजार और बेटे का चार हजार रुपये कर दिया। हालांकि, इससे असंतुष्ट होकर पत्नी ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण दाखिल की। याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि पति पुलिस विभाग में कांस्टेबल है। उसका मासिक वेतन 55 हजार रुपये से ज्यादा है। लिहाजा, पत्नी व बच्चे को मिल रही भरण पोषण की रकम पति की मासिक आय के मुकाबले बहुत कम है।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया। कहा कि भरण पोषण की राशि पति की भुगतान क्षमता के अनुरूप होनी चाहिए। मौजूदा मामले में पति का वेतन 55 हजार रुपये महीने है। पत्नी और नाबालिग बच्चे का भरण-पोषण करना पति का दायित्व है। पति को भरण पोषण की बढ़ी राशि एक अक्तूबर से देय होगी।



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