High Court: Substantial grounds required to cast doubt on a dying declaration; life sentence upheld.

इलाहाबाद हाईकोर्ट।
– फोटो : अमर उजाला।

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के एक मामले में कहा कि मृत्यु पूर्व बयान की विश्वसनीयता पर संदेह करने के लिए ठोस आधार होना जरूरी है। केवल मामूली विरोधाभास के आधार पर मृत्यु पूर्व बयान को खारिज नहीं किया जा सकता। अदालत ने चश्मदीद गवाह की गवाही, डॉक्टर की पुष्टि और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से मृतक के बयान की पुष्टि होने पर आरोपी की अपील खारिज कर दी। साथ ही हत्या के मामले में सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी। यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने दिया है।


बरेली निवासी कृष्ण कुमार उर्फ कुंभकरण पर आरोप था कि उसने फरवरी 1987 की रात को जमीन विवाद में भीम सिंह के पेट में गुप्ती से वार किया था। घायल भीम सिंह को अस्पताल ले जाया गया जहां 25 फरवरी की सुबह उनकी मौत हो गई। घायल का मृत्यु पूर्व बयान कार्यपालक मजिस्ट्रेट ने दर्ज किया था। ट्रायल कोर्ट ने जुलाई 1989 को अपीलकर्ता को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

आरोपी की ओर से दलील दी गई कि प्राथमिकी और मृत्यु पूर्व बयान में घायल को अस्पताल पहुंचाने के तरीके को लेकर अंतर है। चश्मदीद गवाह के बयान दर्ज करने में भी देरी हुई थी। आरोपी ने अपने पिता को बचाने के दौरान हुई हाथापाई में गलती से चोट पहुंचाई थी। राज्य सरकार की ओर से इसका विरोध करते हुए कहा गया कि घटनाक्रम के मूल तथ्यों और हमलावर की पहचान में कोई ऐसा विरोधाभास नहीं है जिससे अभियोजन की कहानी पर संदेह हो।

हाईकोर्ट ने पाया कि मृत्यु पूर्व बयान की पुष्टि चश्मदीद की गवाही और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से भी होती है। अदालत ने कहा कि अस्पताल पहुंचाने के तरीके में मामूली अंतर से अभियोजन की पूरी कहानी अविश्वसनीय नहीं हो जाती। इसी के साथ कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी।



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