कचौड़ी के साथ जलेबी का नास्ता अलीगढ़ की पहचान है, लेकिन यहां के बुजुर्गों के लिए इसकी मिठास में एक ऐसी भी याद घुली है, जो 79 साल बाद भी फीकी नहीं पड़ी। 15 अगस्त 1947 को आजादी की खबर जब शहर तक पहुंची, तब ये बुजुर्ग बच्चे या किशोरावस्था में हुआ करते थे। आजादी का पूरा मतलब तब भले न समझ पाए हों, लेकिन उस सुबह की खुशी, गलियों में गूंजते नारे और हाथ में आई जलेबी आज भी उनकी स्मृतियों में ताजा हैं। जब उनसे स्वतंत्र भारत की उस पहली सुबह के बारे में पूछा तो उनकी आंखों में वही चमक लौट आई और बात निकल पड़ी, जलेबी की मिठास में घुल गई थी आजादी की पहली खुशी। स्वतंत्रता आंदोलन के इन्हीं जीवित गवाहों से बातचीत पर आधारित इकराम वारिस की यह रिपोर्ट।

वो सुबह, जब गली में गूंजा- आजाद हो गया देश

मानिक चौक निवासी 93 वर्षीय मंगलसेन को 15 अगस्त 1947 की सुबह आज भी याद है। बताते हैं कि मोहल्ले का माहौल रोज से अलग था। बड़े लोग उत्साहित थे और बच्चे यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि आखिर हुआ क्या है। चारों तरफ यही सुनाई दे रहा था- देश आजाद हो गया, हमें स्वराज मिल गया, अंग्रेज देश छोड़कर चले गए। मंगलसेन बताते हैं कि घर से बाहर निकले तो किसी ने बच्चों को गरम जलेबी बांटी। हाथ में जलेबी आई तो खुशी और बढ़ गई। उस उम्र में आजादी की गहराई समझ में नहीं आई, लेकिन वह दिन बाकी दिनों से बिल्कुल अलग था।

बड़े खुश थे, हम बच्चों को बस जलेबी याद रही

ब्रह्मनपुरी निवासी 93 वर्षीय रमेश वार्ष्णेय बताते हैं कि सुबह से ही मोहल्ले में चहल-पहल थी। बड़े लोग आपस में आजादी की बातें कर रहे थे। बच्चे उनकी बातें सुनते, फिर अपनी दुनिया में लौट जाते। कभी गली में दौड़ते तो कभी दोस्तों के साथ खेलने लगते। वह कहते हैं कि उस समय आजादी का मतलब समझ में नहीं आया था। वर्षों बाद इतिहास पढ़ा तो अहसास हुआ कि जिस दिन को हम बच्चों ने खेलते और मिठाई खाते हुए देखा था, वह देश के लिए सदियों में आने वाला ऐतिहासिक दिन था।

उस जलेबी का स्वाद आज भी याद है

91 वर्षीय मोहनलाल वार्ष्णेय बताते हैं कि 15 अगस्त की सुबह हवा में ही कुछ अलग महसूस हो रहा था। बड़े लोग उत्साहित थे और बच्चे भी नारे लगा रहे थे। देश आजाद होने की बात सुनकर हर कोई खुश था, हालांकि बच्चों को उस खुशी की पूरी वजह नहीं मालूम थी। वह कहते हैं, समय बीत गया, देश बदल गया और हम बच्चे भी बड़े हो गए। लेकिन उस दिन की जलेबी का स्वाद आज भी याद है। वह जलेबी उनके लिए सिर्फ मिठाई नहीं थी, बल्कि आजादी की पहली खुशी की वह मिठास थी, जिसे उन्होंने बचपन में महसूस किया था।



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *