
69000 teacher recruitment
– फोटो : अमर उजाला
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प्रदेश की 10 विधानसभा सीटों के लिए होने वाले उपचुनाव की तैयारियों में जुटी भाजपा के लिए 69 हजार शिक्षकों के भर्ती प्रकरण में कोर्ट के फैसले ने मुश्किल खड़ी कर दी है। इस फैसले ने जहां कन्नौज और अयोध्या की दो प्रमुख घटनाओं को लेकर सपा के खिलाफ हमलावर भाजपा को बैकफुट पर ला दिया है, वहीं, विपक्ष के हाथ में एक बड़ा और प्रभावी सियासी मुद्दा थमा दिया है। इस घटना को लेकर जिस तरह से पूरे विपक्ष ने भाजपा को घेरना शुरू कर दिया है, उससे स्पष्ट है कि प्रदेश की सियासत में इस मुद्दे को लंबे समय तक भुनाने का प्रयास किया जाएगा। माना जा रहा है कि यह मुद्दा अब सिर्फ विधानसभा उपचुनाव तक ही नहीं, बल्कि 2027 के चुनाव पर भी प्रभाव डालेगा।
आरक्षण जैसे संवेदनशील मसले पर संभल कर बैटिंग कर रही सत्ता पक्ष के सामने असहजता की स्थिति है। ऐसे समय जब दस सीटों पर उपचुनाव होने हैं, नौकरी और आरक्षण जैसे विषयों पर सरकार किसी एक तरफ झुकने से बचना चाह रही है। यदि सूची रद्द होती है तो पहले से नौकरी कर रहे युवाओं के सामने एक बड़ा संकट आएगा। यह एक ऐसा ज्वलंत मुद्दा होगा जिससे सरकार हर हाल में बचना चाहेगी। सरकार यह जानती है कि नौकरी और आरक्षण ऐसे दो मुद्दे हैं जिन पर विपक्ष लोकसभा चुनाव में पूरी तरह से हमलावर रहा है। सपा के 37 सीटें जीतने में इन दो मुद्दों ने बड़ी भूमिका निभाई है। निश्चित ही इस मुद्दे को विपक्ष हाथों-हाथ लपकने में देर नहीं करेगा। विपक्षी पार्टियों के नेताओं को सुर यह बताते हैं कि यह फैसला भले ही कोर्ट का हो, लेकिन इस मसले पर वह सरकार को कटघरे में खड़ा करने की पूरी कोशिश करेंगे।
सपा ने अपनाया आक्रामक रुख
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस मामले में भाजपा सरकार पर तीखी हमला करके यह जता दिया है कि वह अब इस मुद्दे को खत्म नहीं होने देंगे। इसे लंबे समय तक जिंदा रखकर भाजपा के लिए मुश्किल खड़ा रखने की कोशिश करेंगें। सपा इस मुद्दे को धार देने के लिए रणनीति भी तैयार कर रही है, जिसका असर आने वाले उपचुनाव पर भी पड़ेगा। सपा अध्यक्ष ने यह भी साफ कर दिया है कि अभ्यर्थियों की मांग के साथ नाइंसाफी नहीं होगी। सपा उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर अंत तक खड़ी रहेगी।
डैमेज कंट्रोल में जुटी सरकार
इस मसले पर अब सरकार भी डैमेज कंट्रोल में जुट गई है। हालांकि इसका क्या रास्ता निकलेगा, इसका फैसला रविवार को मुख्यमंत्री के साथ शिक्षा विभाग के अधिकारियों की बैठक में होगा। लेकिन इतना तय है कि सरकार और संगठन दोनों मिलकर इस मुद्दे के प्रभाव को बेअसर करने को लेकर कई विकल्पों पर विचार करने में जुटे हैं। सत्ता पक्ष की ओर से इसकी ऐसी काट तैयार की जा रही है कि यह मुद्दा अधिक दिनों तक जिंदा ही न रहे। कोशिश है कि उपचुनाव की घोषणा होने से पहले इस मुद्दे की धार को कुंद कर दी जाए।
