मिट्टी से बना हुआ आदमी
नाना पाटेकर की कहानी किसी फिल्मी कहानी जैसी नहीं है, वो असल ज़िंदगी जैसी है – खुरदरी, सच्ची और जिद्दी।
1. मुरुड का वो लड़का
1 जनवरी 1951, महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा का एक छोटा सा घर। पिता दीनकर पाटेकर एक कपड़ा मिल में छोटे से नौकरीपेशा, माँ संजना गृहिणी। घर में पैसों की हमेशा तंगी।

बचपन में ही नाना ने देख लिया था कि जिंदगी गुलाबी नहीं होती। 5 साल की उम्र में ही नाना माँ के साथ मजदूरी करने जाते थे। लेकिन उसी बचपन में एक और चीज़ मिली – रंगमंच। स्कूल के नाटकों में वो बच्चा जो सबसे तेज बोलता था, सबसे सच बोलता था।

कहते हैं, नाना ने अपने पिता की धोती से अपना पहला थिएटर का परदा बनाया था।
2. भूख, संघर्ष और FTII
पढ़ाई में वो औसत थे, पर जुनून में अव्वल। सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स से पेंटिंग सीखी, फिर पुणे के FTII में दाखिला। जेब में पैसे नहीं होते थे, तो कभी पोस्टर बनाते, कभी फिल्म के सेट पर पेंट करते।

1978 में आई गमन – पहली छोटी सी भूमिका। फिर सालों तक इंतजार। कोई गॉडफादर नहीं, कोई सिफारिश नहीं। नाना अकेले ही प्रोड्यूसरों के दफ्तर के बाहर घंटों बैठे रहते। लोग उन्हें घमंडी कहते, पर वो घमंड नहीं, आत्मसम्मान था।

फिर 1986 में आई *अंकुश*। और इस लड़के ने पर्दा फाड़ दिया।
3. गुस्सा जो सच बन गया
नाना का गुस्सा नकली नहीं था। वो उस सिस्टम पर गुस्सा था जो गरीब को कुचलता है। परिंदा (1989), क्रांतिवीर (1994), अग्निसाक्षी, अपहरण, अभय – हर किरदार में वो मुरुड वाला लड़का जिंदा था।

“आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने” – ये डायलॉग नहीं, उनके भीतर का दर्द था।

उन्हें 3 नेशनल अवॉर्ड मिले, लेकिन वो अवॉर्ड लेकर कभी इतराए नहीं। मुंबई में आज भी वो 1BHK में रहते हैं, खुद सब्जी लेने जाते हैं।
4. वर्दी वाला एक्टर
बहुत कम लोग जानते हैं, नाना ने 1990 में कारगिल युद्ध के दौरान सेना के साथ 2 साल तक टेरिटोरियल आर्मी में सेवा की है। उन्हें मानद कैप्टन का रैंक मिला। वो कहते हैं – “एक्टर बनना आसान है, आदमी बनना मुश्किल।”

2015 में जब महाराष्ट्र में किसान आत्महत्या कर रहे थे, नाना और मकरंद अनासपुरे ने नाम फाउंडेशन बनाया। अपनी जेब से करोड़ों दिए, विदर्भ और मराठवाड़ा के सूखे गांवों में पानी पहुंचाया। कैमरा के बिना, प्रचार के बिना।
असली कहानी क्या है?
नाना पाटेकर की कहानी स्टारडम की नहीं है। वो कहानी है एक आदमी की जो कभी नहीं बदला।

आज भी जब वो किसी गांव में जाते हैं, तो किसान उन्हें हीरो नहीं, अपना भाई समझते हैं। क्योंकि वो जानते हैं, ये आदमी मिट्टी से बना है, और मिट्टी को कभी नहीं भूलता।

By Parvat Singh Badal (Bureau Chief Jalaun)✍️

A2Z News UP Parvat singh badal (Bureau Chief) Jalaun ✍🏻 खबर वहीं जों सत्य हो

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