मशहूर शायर बशीर बद्र आगरा से लगाव रखते थे। वह कई दफा मुशायरों में आगरा आए। उनके भाई सगीर भी कुछ साल तक आगरा में रेलवे में तैनात रहे थे। उनके निधन पर अदब से जुड़े कई लोगों ने खिराज-ए-अकीदत पेश करते हुए उन्हें आम जनता का शायर बताया।

बैकुंठी देवी कॉलेज में उर्दू की विभागाध्यक्ष और साहित्यकार नसरीन बेगम बताती हैं कि बशीर बद्र ऐसे शायर थे, जिन्होंने सभी के दिलों पर राज किया। उनकी शायरी में आम आदमी का दर्द झलकता है। उन्होंने उर्दू गजल को नई जिंदगी दी। उनका शेर ‘उजाले अपनी यादों के हमारे पास रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए’ बेहद पसंद किया जाता है। वह शेर पढ़ने के साथ ही गजलों को तरन्नुम में पेश करते थे। वह पहली बार 1983 में ऑल इंडिया मुशायरे में आगरा आए थे। इसके बाद अक्सर अपने भाई के यहां भी आते-जाते थे। इस कारण उनका आगरा से लगाव रहा।

शायर अमीर अहमद ने कहा कि बशीर बद्र साहब लंबे समय से बीमार होने के कारण सार्वजनिक मंच पर नहीं आए, लेकिन उनकी शायरी आम आदमी से गहराई तक जुड़ी है। यही कारण है कि वह अवाम के शायर थे। उनका जाना उर्दू अदब के लिए गहरा आघात है।

हिंदुस्तानी बिरादरी की बैठक में अजीम शायर बशीर बद्र को खिराज-ए-अकीदत पेश की गई।

अध्यक्ष डॉ. सिराज कुरैशी ने कहा कि उनकी शायरी में मोहब्बत, सच्चाई, दर्द और इंसानी रिश्तों की गहराई साफ दिखाई देती थी। उनकी शायरी किताबों तक सीमित नहीं रही, बल्कि आम आदमी की जुबान और रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बन गई। बिरादरी के विशाल शर्मा ने कहा कि बशीर बद्र की शायरी में समाज, इंसानियत और देश के बंटवारे के दर्द को भी बड़ी शिद्दत से बयां किया गया।



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