जसवंतनगर। रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर बढ़ती निर्भरता के बीच गांव सिरहोल निवासी किसान अरविंद प्रताप सिंह परिहार ने गो-आधारित प्राकृतिक खेती अपनाई है। करीब एक दशक में उन्होंने प्राकृतिक खेती का दायरा बढ़ाकर लगभग 3.4 हेक्टेयर कर लिया है।
अरविंद प्रताप सिंह परिहार ने वर्ष 2016-17 में प्राकृतिक खेती की शुरुआत की। इससे पहले वह अपने पूरे कृषि क्षेत्र में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग करते थे। बढ़ती लागत, मिट्टी की गुणवत्ता में कमी और पर्यावरण पर पड़ रहे प्रतिकूल प्रभाव को देखते हुए कृषि विभाग ने उन्हें गो-आधारित प्राकृतिक खेती के लिए प्रशिक्षित किया था। शुरुआती दौर में उन्होंने करीब 0.4 हेक्टेयर भूमि में प्राकृतिक तरीके से शाक भाजी के साथ सह-फसली खेती में अमरूद, बेर समेत अन्य फसलों का उत्पादन किया। इसके सकारात्मक परिणाम मिलने पर उन्होंने वर्ष 2020-21 में करीब एक हेक्टेयर में खरीफ में धान-बाजरा व रबी में सरसों-गेहूं की प्राकृतिक खेती शुरू की। उन्होंने नई प्रजाति के काले गेहूं का भी उत्पादन किया, जिससे उत्पाद की गुणवत्ता और मांग में बढ़ोतरी हुई। कृषि विभाग की ओर से समय-समय पर उनके खेत का निरीक्षण कर प्राकृतिक खेती में उपयोग होने वाले जीवामृत, घनजीवामृत, पंचगव्य और दशपर्णी अर्क जैसे जैविक इनपुट तैयार करने और उनके प्रयोग की जानकारी दी गई। इसके बाद वर्ष 2021-22 में उन्होंने अपना क्षेत्र बढ़ाकर करीब तीन हेक्टेयर कर लिया। वर्तमान में लगभग 3.4 हेक्टेयर भूमि पर प्राकृतिक खेती की जा रही है।
प्राकृतिक खेती से किसान को कई लाभ मिले। रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होने से खेती की लागत घटी और सिंचाई की आवश्यकता भी अपेक्षाकृत कम हुई। मिट्टी की उर्वरता में सुधार के साथ फसलों की गुणवत्ता बेहतर हुई। खेत में करीब 25 प्रकार के फल, सात प्रकार की सब्जियां और तीन प्रकार के खाद्यान्न सहित विभिन्न फसलों का उत्पादन किया जा रहा है।
अरविंद प्रताप सिंह का कहना है कि गो-आधारित प्राकृतिक खेती से लागत कम करने के साथ मिट्टी की उर्वरता, पर्यावरण और खाद्यान्न की गुणवत्ता को बेहतर बनाया जा सकता है। कृषि विभाग का कहना है कि यह मॉडल क्षेत्र के अन्य किसानों को भी टिकाऊ और कम लागत वाली खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रहा है।
