अक्सर पढ़ते और सुनते हैं कि उजाले की कमी से कई बीमारियां होती हैं लेकिन चिकित्सकों के मुताबिक, शरीर के लिए अंधेरा भी उतना ही जरूरी है जितना कि उजाला। भागदौड़ भरी जिंदगी में सूरज ढलने के बाद भी कृत्रिम उजाले में काम करना लोगों की आदत बन चुकी है। इससे कई तरह की बीमारियां बढ़ रही हैं।

केजीएमयू के मनोरोग विभाग के मनोचिकित्सक डॉ. सुजीत कुमार, हृदय रोग विभाग के प्रो. ऋषि सेठी और स्त्री कैंसर रोग विशेषज्ञ प्रो. निशा सिंह बताती हैं कि कृत्रिम उजाले की वजह से शरीर के अंदर की जैविक घड़ी प्रभावित होती है। इससे हृदय व मानसिक रोग और कैंसर का खतरा बढ़ता है। आज बेडरूम में सजावट के लिए कृत्रिम रोशनी का इस्तेमाल फैशन बन चुका है। यह स्थिति भी अच्छी नहीं। कायदे से शयन कक्ष में सोते समय अच्छी तरह से अंधेरा होना चाहिए।

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अंधेरे की कमी से बढ़ रहे अवसाद, अनिद्रा के मामले

मनोचिकित्सक डॉ. सुजीत कुमार कर बताते हैं कि मस्तिष्क में अंधेरा होने पर मेलाटोनिन हार्मोन का स्राव होता है। यह गहरी और सुकून भरी नींद देता है। कृत्रिम रोशनी से मेलाटोनिन का बनना बंद या कम हो जाता है। इससे शरीर की प्राकृतिक जैविक घड़ी पटरी से उतर जाती है। अंधेरे की कमी से शहरों में अनिद्रा, बेचैनी और अवसाद के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।

कृत्रिम रोशनी से दिल को पहुंचती है चोट

हृदय रोग विशेषज्ञ प्रो. ऋषि सेठी बताते हैं कि रात बारह बजे से सुबह छह बजे तक कृत्रिम उजाले में रहने से हृदय रोगों का खतरा भी बढ़ता है। इसकी वजह है कृत्रिम उजाले से जैविक घड़ी का बिगड़ना। इससे नींद की गुणवत्ता खराब होती है जिससे तनाव बढ़ता है। यह हृदय संबंधी बीमारियों को बढ़ाने में सहायक होता है।

कमजोर होती है कैंसर से लड़ने की क्षमता

केजीएमयू में स्त्री कैंसर रोग विभाग की अध्यक्ष प्रो. निशा सिंह बताती हैं कि मेलाटोनिन हार्मोन कम होने से त्वचा कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। बहुत कम मेलाटोनिन गतिविधि ट्यूमर से लड़ने के लिए शरीर की क्षमता को भी कम कर सकती है।

ऐसे सुधारें अपनी दिनचर्या

डिजिटल डिटॉक्स सोने से कम से कम एक घंटा पहले मोबाइल, लैपटॉप और टीवी से दूरी बना लें।

अंधेरे में सोएं: सोते समय कमरे में पूरी तरह अंधेरा रखें। यदि बाहर से रोशनी आती है, तो मोटे पर्दे का इस्तेमाल करें।

कृत्रिम रोशनी से दूरी: रात बारह बजे से सुबह छह बजे तक कृत्रिम रोशनी से दूर रहें।



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