इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वक्फ संपत्ति हड़पने और धोखाधड़ी के आरोपों से घिरे कानपुर नगर के अधिवक्ता डॉ. अखिलेश दुबे की जमानत अर्जी सशर्त मंजूर कर ली है। यह आदेश न्यायमूर्ति हरवीर सिंह की एकल पीठ ने मामले की परिस्थितियों और अन्य अभियुक्तों को मिली राहत के आधार पर दिया है।

याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि याची को बदनाम करने के उद्देश्य से वर्ष 2025 में बिना किसी ठोस सबूत के कई एफआईआर दर्ज कराई गई थीं। विवादित वक्फ संपत्ति हाफिज अली ने वर्ष 1911 में 99 वर्ष की लीज पर दी थी। इसलिए वर्ष 2010 से पहले इस पर कोई दावा नहीं किया जा सकता था।

घर में घुसकर जबरन हस्ताक्षर कराने और पांच लाख रुपये की मांग करने के आरोपों को निराधार बताते हुए दलील दी कि प्रश्नगत संपत्ति को लेकर पहले से ही सिविल वाद लंबित है। याची के अधिवक्ता ने यह भी दावा किया कि मुन्नी देवी की पावर ऑफ अटार्नी पूरी तरह वैध है। लिहाजा, इसके उपयोग को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

सुनवाई के दौरान अदालत ने इस तथ्य को संज्ञान में लिया कि इस मामले में तीन सह-अभियुक्त सौम्या दुबे, सर्वेश दुबे और राजकुमार शुक्ल को पहले ही अग्रिम जमानत मिल चुकी है। वहीं, दो अन्य अभियुक्तों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी कार्यवाही पर रोक लगा दी है। लिहाजा, कोर्ट ने सशर्त जमानत मंजूर कर ली।



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