इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बीए एलएलबी नौवें सेमेस्टर के एक छात्र की याचिका खारिज कर दी है। छात्र को बायोडायवर्सिटी प्रोटेक्शन लॉ विषय में शून्य अंक मिले थे। कोर्ट ने इस दौरान देश में कानूनी शिक्षा के स्तर पर गंभीर चिंता व्यक्त की। अदालत ने कहा कि किसी विधि छात्र की उत्तर पुस्तिका का यह स्तर संबंधित शिक्षण संस्थान की शैक्षणिक गुणवत्ता पर भी प्रश्न खड़े करता है।
कोर्ट ने बार कौंसिल ऑफ इंडिया से संबंधित संस्थान के शैक्षणिक एवं आधारभूत ढांचे की समीक्षा करने तथा लॉ कमीशन ऑफ इंडिया से देश में कानूनी शिक्षा के मानकों पर अध्ययन कर आवश्यक सुधारों पर विचार करने के लिए कहा है। यह आदेश न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने एक विधि छात्र की याचिका पर दिया है।
प्रयागराज निवासी याची ने अदालत से उत्तर पुस्तिका का पुनर्मूल्यांकन कर अंक संशोधित करने की मांग की थी। छात्र का कहना था कि उसने सभी प्रश्न हल किए थे लेकिन उसे संबंधित विषय में शून्य अंक मिले। इसके बाद उसने सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत उत्तर पुस्तिका प्राप्त की और विश्वविद्यालय से पुनर्मूल्यांकन की मांग की लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसपर उसने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
कोर्ट ने मूल प्रश्नपत्र और उत्तर पुस्तिका मंगाकर उनका परीक्षण किया। कहा कि उत्तरों में न तो विषय से संबंधित कानूनी समझ दिखाई देती है और न ही कोई तार्किक एवं सुसंगत विश्लेषण। ऐसे में परीक्षक की ओर से शून्य अंक दिया जाना पूरी तरह उचित है। कोर्ट ने कहा कि अकादमिक मूल्यांकन में न्यायिक हस्तक्षेप तभी संभव है जब मूल्यांकन प्रक्रिया में मनमानी, दुर्भावना या कानूनी त्रुटि साबित हो। इस मामले में ऐसा कोई आधार नहीं मिला।
