पुलिस थानों की कार्यप्रणाली हमेशा सवालों के घेरे में रहती है। कई बार फरियादियों की प्राथमिकी दर्ज नहीं की जाती। ऐसे मामलों में फरियादियों ने अदालतों की शरण ली, तब प्राथमिकी दर्ज की गई। अदालत के आदेश पर पुलिस को प्राथमिकी तो दर्ज करनी पड़ी, लेकिन इसमें फरियादियों का समय और धन भी बर्बाद हुआ। अहम बात यह कि लूट, दुष्कर्म, धोखाधड़ी जैसे संवेदनशील मामलों में भी पुलिस का यह रवैया सामने आया है। पिछले तीन माह के दौरान 50 से अधिक मामले कोर्ट के आदेश के बाद दर्ज करने पड़े।
झांसी के 27 थानों में रोजाना औसतन 15 से 20 शिकायती पत्र पहुंचते हैं। इसके मुकाबले थानों में प्राथमिकी दर्ज होने का औसत रोजाना दो से भी कम है। इनमें कई मामले वरिष्ठ पुलिस अफसरों के हस्तक्षेप के बाद दर्ज होते हैं। शिकायत के बावजूद थाना स्तर पर कार्रवाई न होने पर पीड़ित अदालत पहुंचते हैं।
अदालत संबंधित थाना पुलिस से आख्या मांगती है। पुलिस की रिपोर्ट और शिकायत में लगाए गए आरोपों पर विचार के बाद अदालत प्राथमिकी दर्ज कर विवेचना कराने का आदेश देती है। इनमें महिला अपराध से जुड़े मामले भी शामिल हैं। हालांकि, प्रभारी एसएसपी डॉ. अरविंद कुमार का कहना है कि थाना स्तर पर पर आए प्रार्थना पत्र पर गंभीरता से जांच होती है। कई मामलों में नए तथ्य न्यायालय के समक्ष बताए जाते हैं।
केस-1
महंत के खिलाफ दो महिलाओं ने दर्ज कराई एफआईआर
चर्चित संत वैदेही वल्लभ शरण के खिलाफ भी अदालत के आदेश पर पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करनी पड़ी। दोनों महिलाओं ने प्लॉट दिलाने के नाम पर रकम लेने और बाद में जमीन का बैनामा न करने का आरोप लगाया था। पुलिस से शिकायत के बावजूद सुनवाई न होने पर दोनों महिलाएं अदालत पहुंचीं। उनका कहना है कि संत की राजनीतिक रसूख के चलते पुलिस मामला दर्ज करने से कतरा रही है। अदालत के आदेश के बाद कोतवाली पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की।
केस-2
दरोगा समेत पांच पुलिसकर्मियों पर भी कोर्ट के आदेश के बाद रिपोर्ट
दरोगा समेत पांच पुलिसकर्मियों पर लूट का सनसनीखेज आरोप लगने के बाद पुलिस उनके खिलाफ मामला दर्ज करने में टालमटोल करती रही। पंचवटी कॉलोनी निवासी शारिक सिद्दीकी ने आरोप लगाया कि नवंबर 2025 में उसकी स्कूटी में रखे छह लाख रुपये और दो मोबाइल फोन पुलिसकर्मियों ने लूट लिए। कोतवाली प्रभारी और एसएसपी से शिकायत के बाद भी कार्रवाई नहीं हुई। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट सुधा यादव की अदालत ने 20 अगस्त, 2026 को दरोगा राजेश अवस्थी समेत चार सिपाहियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया। अदालत के आदेश के बावजूद 42 दिन तक प्राथमिकी दर्ज नहीं हुई। शनिवार को आखिरकार पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की।
केस-3
कारोबारी के खिलाफ भी लेना पड़ा सहारा
कारोबारी भरत प्रेमानी पर धोखाधड़ी के आरोप लगने पर भी नवाबाद पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया। मजबूरन सिविल लाइंस निवासी मयंक प्रेमानी को कोर्ट की शरण लेना पड़ा। आरोप है कि कारोबारी भरत प्रेमानी ने फर्जी हस्ताक्षर करके फर्म और बैंक खाता खोल लिया। उसके सहारे करीब दो करोड़ रुपये के फर्जीवाड़ा किया। अदालत के आदेश पर नवाबाद पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की।
केस-4
युवती को भी लेनी पड़ी कोर्ट की शरण
प्रेमनगर क्षेत्र निवासी युवती को भी युवक ब्लैकमेल कर रकम वसूल रहा था। युवती ने आरोपी की प्रेमनगर थाने में शिकायत की, लेकिन उसकी सुनवाई नहीं हुई। इसके बाद उसने कोर्ट की शरण ली। कोर्ट के आदेश के बाद आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज हुआ।
थानों में शिकायतों का ढेर, एफआईआर का आंकड़ा कम
नवाबाद, सीपरी बाजार, प्रेमनगर, कोतवाली, उल्दन समेत थानों में रोजाना औसतन 15 से 20 शिकायती पत्र पहुंचते हैं। इसके मुकाबले प्राथमिकी दर्ज होने का औसत रोजाना दो से भी कम बताया गया है। सितंबर में आठ थानों में दर्ज मामलों की संख्या नवाबाद में 50, प्रेमनगर में 27, सीपरी बाजार में 34, कोतवाली में 22, रक्सा में 17, बड़ागांव में 13, बबीना में 23 और उल्दन में 10 रही। रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें कई मामले वरिष्ठ अधिकारियों की दखल के बाद दर्ज हुए।
अब 175(3) बना सहारा
अधिवक्ता राजेश मिश्र के मुताबिक, पहले दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 156(3) के तहत मजिस्ट्रेट के पास आवेदन देकर पुलिस को अपराध की जांच का आदेश देने की मांग की जाती थी। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता लागू होने के बाद इसका प्रावधान धारा 175(3) के तहत किया गया है। इसके तहत मजिस्ट्रेट आवेदन और पुलिस की ओर से प्रस्तुत आख्या पर विचार करने तथा आवश्यक जांच के बाद पुलिस को आदेश देते हैं।
