गणेश चतुर्थी पर सोमवार को घर-घर भगवान गणेश की स्थापना होगी। कहीं वह विघ्नहर्ता के रूप में विराजेंगे तो कहीं सिद्धिविनायक के रूप में पूजे जाएंगे। लेकिन बुंदेलखंड की मूर्तिकला में उनका एक ऐसा रूप भी मिलता है, जिसमें वह पत्थर में थिरकते दिखाई देते हैं। राजकीय संग्रहालय झांसी में संरक्षित नृत्यरत गणेश की दो अलग-अलग प्रतिमाएं प्राचीन शिल्पकारों की कल्पना और गणेश के नृत्य स्वरूप की परंपरा को सामने लाती हैं।
इनमें एक प्रतिमा में गणेश को नृत्य की गतिशील मुद्रा में अकेले नहीं, बल्कि संगीत और नृत्य के पूरे परिवेश के बीच दिखाया गया है। प्रतिमा के चारों ओर बने पात्र और अलंकरण इसे सामान्य गणेश प्रतिमाओं से अलग बनाते हैं। प्रभामंडलनुमा संरचना के भीतर गणेश की मुद्रा और उनके आसपास के पात्र शिल्पकार द्वारा रचे गए नृत्य के दृश्य को जीवंत करते हैं।
दूसरी प्रतिमा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसकी पट्टिका पर इसे ‘नृत्यरत गणेश’ बताया गया है और प्राप्ति स्थल सीरोनखुर्द, ललितपुर दर्ज है। यह बलुआ पत्थर की प्रतिमा है और झांसी के राजकीय संग्रहालय में इसका क्रमांक 81.45 है। राजकीय संग्रहालय झांसी के निदेशक मनोज कुमार गौतम बताते हैं कि दोनों नृत्यरत गणेश प्रतिमाएं सीरोनखुर्द, ललितपुर से मिली हैं। दोनों का काल 10वीं सदी का है। इन प्रतिमाओं में गणेश को पारंपरिक शांत मुद्रा से अलग नृत्य करते हुए दर्शाया गया है।
14 भुजाओं में शिल्पकार ने रचा नृत्य
सीरोनखुर्द की इस प्रतिमा की सबसे खास बात इसकी 14 भुजाएं हैं। इनमें अधिकांश अब खंडित हो चुकी हैं, लेकिन बची हुई भुजाओं में सर्प, माला और परशु जैसे प्रतीकों का उल्लेख मिलता है। गणेश का एक पैर उठा हुआ है और दूसरा शरीर का भार संभाल रहा है। इस मुद्रा से प्रतिमा में गति का अहसास होता है। झांसी के राजकीय संग्रहालय में इसका क्रमांक 81.95 है। प्रतिमा में गणेश के आसपास वाद्ययंत्र बजाते कलाकार भी बनाए गए हैं। पैरों के पीछे उनका वाहन मूषक दिखाई देता है। उनके शरीर पर आभूषणों का बारीक अंकन है और पेट के ऊपर सर्प के रूप में यज्ञोपवीत बनाया गया है। पीछे का हिस्सा भी बारीकी से तराशा गया है, जिससे पता चलता है कि शिल्पकार ने प्रतिमा को केवल सामने से देखने के लिए नहीं बनाया था।
