डेढ़ सौ साल पुराने पारीछा बांध को देश की पुरानी और बेहतरीन इंजीनियरिंग वाली सिंचाई परियोजनाओं में शामिल किया गया है। इंटरनेशनल कमीशन ऑन इरीगेशन एंड ड्रेनेज (आईसीआईडी) ने इसे वर्ल्ड हेरिटेज इरीगेशन स्ट्रक्चर की श्रेणी में चुना है। यह संस्था विश्व की उन पुरानी सिंचाई संरचनाओं को सूचीबद्ध करती है, जो आज भी क्रियाशील हैं। केंद्रीय जल आयोग की ओर से पिछले माह बांध को हेरिटेज सूची में शामिल करने की संस्तुति की गई थी। बुधवार को इसके चयन की जानकारी मिलने के बाद सिंचाई विभाग के अधिकारियों ने खुशी जताई। हेरिटेज सूची में शामिल होने से यहां पर्यटन को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
सिंचाई विभाग के दस्तावेजों के मुताबिक, बेतवा नदी पर बने पारीछा बांध का सर्वे वर्ष 1855 में हुआ था। वर्ष 1857 में गदर के कारण इसका निर्माण प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया। इसके बाद वर्ष 1875 में पारीछा गांव के पास बांध बनकर तैयार हुआ। पूरा बांध पत्थर, चूना और सुर्खी से बनाया गया है। पानी रोकने के लिए इसमें 318 गेट लगाए गए हैं, जो आज भी काम कर रहे हैं। मानसून के बाद पानी रोकने के लिए सभी गेट खड़े कर दिए जाते हैं। अधिशासी अभियंता बृजेश कुमार पोरवाल ने बताया कि हेरिटेज सूची में शामिल होने के बाद बांध को संरक्षित रखा जाएगा। यहां पर्यटन संबंधी सुविधाएं विकसित की जाएंगी, जिससे पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने की उम्मीद है।
महज 40 लाख रुपये में बना था बांध
डेढ़ सौ साल पहले बने पारीछा बांध के निर्माण में उस समय करीब 40 लाख रुपये खर्च हुए थे। आज इसी क्षमता का बांध बनाने में करीब 2,000 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। निर्माणाधीन एरच बांध की लागत ही करीब 1,800 करोड़ रुपये पहुंच चुकी है। पुराने दस्तावेजों के मुताबिक, ब्रिटिश अभियंता स्ट्राची ने बांध के लिए इस स्थान का चयन किया था। 1,174 मीटर लंबे बांध में शुरुआत में 40 एमसीएम (मिलियन क्यूबिक मीटर) पानी का भंडारण होता था। पानी की जरूरत बढ़ने पर 10 साल बाद शटरिंग लगाकर इसकी भंडारण क्षमता बढ़ाई गई। अब इसमें 70 एमसीएम पानी का भंडारण होता है।
यूपी और एमपी के पांच जिलों को मिल रहा सिंचाई का पानी
पारीछा बांध से उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के पांच जिलों को सिंचाई के लिए पानी मिलता है। उत्तर प्रदेश में झांसी, जालौन और हमीरपुर तथा मध्य प्रदेश में दतिया और भिंड की जमीनें इससे सिंचित होती हैं। रबी और खरीफ सीजन में बांध में संचित पानी से करीब 1.5 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई होती है।
150 साल बाद भी नहीं बदली सूरत
पारीछा बांध के निर्माण को करीब 150 साल बीत चुके हैं लेकिन इसकी मूल संरचना आज भी बरकरार है। पानी रोकने के लिए लगाए गए लोहे के गेट भी अंग्रेजों के जमाने के ही हैं। मानसून में बांध से पानी गिरने का नजारा देखने के लिए हजारों सैलानी पहुंचते हैं। बारिश के दौरान जब बड़ी मात्रा में पानी छोड़ा जाता है तो यहां का दृश्य बेहद आकर्षक होता है। इतनी पुरानी संरचना होने के बावजूद बांध आज भी पूरी तरह क्रियाशील है। हालांकि, इसे केन-बेतवा लिंक परियोजना में भी शामिल किया गया है।
चार साल पहले सुकुवां-ढुकुवां बांध भी हुआ था शामिल
सुकुवां-ढुकुवां बांध को वर्ष 2022 में इसी श्रेणी में शामिल किया जा चुका है। यह भी झांसी के पुराने बांधों में शुमार है। इसका निर्माण वर्ष 1909 में हुआ था और उस समय इसकी लागत 23.98 लाख रुपये आई थी। सिंचाई की जरूरत को देखते हुए निर्माण के बजट में कटौती नहीं की गई थी। वर्तमान में बांध का जलस्तर 273.71 मीटर तक रखा जाता है। पूरा भरने पर इसमें 57.77 मिलियन घन मीटर पानी का भंडारण होता है।
एक नजर में बांध : पारीछा
नदी : बेतवा
जलस्तर : 194.65 मीटर
कुल भंडारण क्षमता : 78.74 एमसीएम
उपयोगी भंडारण क्षमता : 77.18 एमसीएम
नहरें : बेतवा, गुरसराय एवं बड़ागांव पंप नहर
