झांसी। अब बुंदेलखंड में फैलने वाले वायरस के नए वैरिएंट और उनमें होने वाले बदलावों की पहचान स्थानीय स्तर पर हो सकेगी। महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज में वायरस रिसर्च एवं डायग्नोस्टिक लैब (वीआरडीएल) स्थापित करने की तैयारी है। लैब में वायरस की जीनोम सिक्वेंसिंग सहित आधुनिक जांच सुविधाएं विकसित की जाएंगी। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि संक्रमित मरीज में वायरस का कौन सा वैरिएंट है और उसमें कोई नया म्यूटेशन तो नहीं हुआ है।
खास बात यह है कि बुंदेलखंड के सात जिलों के वायरल संक्रमण से जुड़े सैंपल जांच के लिए यहां आएंगे। इनमें झांसी के अलावा ललितपुर, जालौन, हमीरपुर, महोबा, बांदा और चित्रकूट जिले शामिल हैं। लैब शुरू होने के बाद क्षेत्र में किसी नए अथवा तेजी से फैलने वाले वायरल संक्रमण की पहचान और निगरानी को मजबूती मिलेगी।
हाल में प्रदेश में स्वाइन फ्लू के रोगी मिलने के बाद स्वास्थ्य विभाग को अलर्ट किया गया था। संक्रमण की जांच, बचाव और जागरूकता के लिए दिशानिर्देश भी जारी किए गए। इसके बाद वायरल संक्रमणों की जांच सुविधाओं को लेकर जानकारी जुटाई गई। इसी क्रम में महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज के माइक्रोबायोलॉजी विभाग में वायरस रिसर्च एवं डायग्नोस्टिक लैब स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू की गई है।
आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, लैब की स्थापना के लिए मेडिकल कॉलेज के माइक्रोबायोलॉजी विभाग और वहां उपलब्ध जांच सुविधाओं की विस्तृत रिपोर्ट केंद्र सरकार की ओर से मांगी गई थी। मेडिकल कॉलेज ने वर्तमान में उपलब्ध जांच सुविधाओं का विवरण भेज दिया है।
बताया जाता है कि कोरोना काल में आगरा, कानपुर और गोरखपुर में वायरस रिसर्च एवं डायग्नोस्टिक लैब स्थापित की गई थीं, लेकिन उस समय झांसी मेडिकल कॉलेज में यह सुविधा नहीं मिल सकी थी। अब यहां लैब स्थापित होने के बाद वायरल संक्रमण के सैंपलों की जांच की सुविधा विकसित होगी। अधिकारियों का कहना है कि मशीन आने के बाद लैब की स्थापना का काम शुरू किया जाएगा।
वायरस रिसर्च एवं डायग्नोस्टिक लैब के लिए केंद्र सरकार को पूरा मसौदा भेजा जा रहा है। प्रस्ताव के तहत जांच उपकरणों के लिए 82 लाख रुपये और सिविल कार्य के लिए 68 लाख रुपये का बजट स्वीकृत हो गया है। – डॉ. सुधीर कुमार, प्राचार्य, मेडिकल कॉलेज
क्या है जीनोम सिक्वेंसिंग
वायरस समय के साथ अपने आनुवंशिक स्वरूप में बदलाव करता रहता है। जीनोम सिक्वेंसिंग के जरिये उसके आनुवंशिक पदार्थ के क्रम का अध्ययन किया जाता है। इससे वायरस में होने वाले बदलाव यानी म्यूटेशन और उसके अलग-अलग वैरिएंट की पहचान की जा सकती है। स्वाइन फ्लू, कोरोना समेत अन्य वायरल संक्रमणों में यह जांच यह समझने में मदद करती है कि संक्रमित व्यक्ति में वायरस का कौन सा वैरिएंट मौजूद है और उसमें कोई नया आनुवंशिक बदलाव हुआ है या नहीं।
