झांसी। झांसी मंडल में स्थित पांच ऐतिहासिक महत्व की धरोहरों को संरक्षित किया जाएगा। इनमें झांसी की ठाकुरपुरा और डिमरौनी की गढ़ी समेत ललितपुर स्थित लक्ष्मणगढ़ मंदिर, प्रसिद्ध रणछोर मंदिर एवं मर्दन सिंह की बैठक शामिल है। पुरातत्व विभाग की ओर से यह कवायद शुरू कर दी गई है। संरक्षण कार्यों समेत यहां तक आने-जाने के रास्ते भी सुधारे जाएंगे। पर्यटकों के लिए सुविधा जुटाई जाएगी। इस पूरे प्रोजेक्ट पर 15 करोड़ रुपये खर्च होंगे।
इनमें सबसे अधिक पुराना रणछोर मंदिर करीब 12वीं शताब्दी का है, जबकि शेष अन्य इमारतें करीब 18वीं शताब्दी में निर्मित हैं। सैकड़ों साल पुरानी हो जाने से इनमें से कई इमारतों की दीवार, छत, फर्श दरकने लगी हैं। इस वजह से इनकी खूबसूरती भी खत्म हो रही है। इनको पुराने स्वरूप में बनाए रखने के लिए पुरातत्व विभाग दीवारों, छतों, फर्श में सुधारात्मक कार्य कराने जा रहा है। खास बात यह कि पर्यटकों को लुभाने के लिए भी यहां जरूरी कार्य कराए जाएंगे। पुरातत्व अधिकारी राजीव त्रिवेदी ने बताया कि यहां करीब तीन करोड़ रुपये से पर्यटक सुविधाओं संबंधी कार्य कराए जाएंगे, जबकि शेष 12 करोड़ इन इमारतों को संवारने में खर्च होंगे। इनका स्वरूप बनाए रखने के लिए मरम्मत कार्यों में पारंपरिक चूना-सुरखी का ही इस्तेमाल होगा।
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ठाकुरपुरा की गढ़ी
झांसी-ललितपुर राष्ट्रीय राजमार्ग से करीब 27 किलोमीटर दूर बबीना विकासखंड के ठाकुरपुरा गांव में यह गढ़ी स्थित है। विशाल तालाब के किनारे बनी गढ़ी की सुरक्षा के लिए चारों कोनों पर बुर्ज हैं। स्थानीय ग्रेनाइट पत्थरों से बनी गढ़ी में बड़ा आंगन, बरामदे और कई कमरे हैं। करीब 18वीं शताब्दी में बनी इस गढ़ी में क्षतिग्रस्त चिनाई, छत, प्लास्टर और फर्श की मरम्मत होगी। क्रैक्स की स्टिचिंग, सीढ़ियों और पत्थर की छज्जियों का जीर्णोद्धार, वाटरप्रूफिंग, नई सागौन की खिड़कियां-दरवाजे और फसाड लाइटिंग भी कराई जाएगी।
डिमरौनी की गढ़ी
झांसी-कानपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर दिगारा गांव से करीब तीन किलोमीटर दूर डिमरौनी गांव में दो गढ़ियां हैं। इन्हें बड़ी और छोटी गढ़ी के नाम से जाना जाता है। दोनों पहाड़ी पर बनी हैं। इस समय अत्यधिक जीर्ण अवस्था में हैं। करीब 18वीं शताब्दी में स्थानीय ग्रेनाइट पत्थरों से इनका निर्माण हुआ था। यहां भी चिनाई, प्लास्टर, फर्श और छतों की मरम्मत होगी। चारों ओर बाउंड्रीवाल के साथ बिजली, पानी और पहुंच मार्ग पर दिशासूचक बोर्ड लगाए जाएंगे।
लक्ष्मणगढ़ मंदिर
ललितपुर मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर पिपरई गांव में 18वीं शताब्दी का बना लक्ष्मणगढ़ मंदिर में स्तंभों पर आधारित मंडप और वर्गाकार गर्भगृह है। मंदिर चारों ओर पत्थर के परकोटे से घिरा है, जिससे यह छोटे दुर्ग जैसा दिखाई देता है। मंदिर की चहारदीवारी, वाटरप्रूफिंग, दरारों की स्टिचिंग, विद्युत व्यवस्था, फसाड लाइटिंग और सूचना पट्ट लगाने का कार्य कराया जाएगा।
रणछोर मंदिर
ललितपुर मुख्यालय से करीब 37 किलोमीटर दूर स्थित रणछोर मंदिर करीब 12वीं शताब्दी का बताया गया है। मंदिर में अर्धमंडप, मंडप और गर्भगृह है। परिसर में छोटे देवालय भी हैं, जिससे इसके पंचायन शैली के मंदिर होने का संकेत मिलता है। संरक्षण के तहत क्षतिग्रस्त पत्थरों को हटाकर नए गुलाबी सैंड स्टोन की फर्श लगाई जाएगी। छतों की मरम्मत, पत्थरों का रासायनिक उपचार और गर्भगृह में स्थापित प्राचीन प्रस्तर प्रतिमाओं की सफाई एवं परि रक्षण किया जाएगा। परिसर में लैंडस्केपिंग, सोलर लाइट, स्टोन बेंच, वाटर कूलर और सूचना पट्ट भी लगाए जाएंगे।
मर्दन सिंह की बैठक
ललितपुर मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर बिजरौठा गांव स्थित मर्दन सिंह की प्राचीन बैठक स्थित है। 18वीं-19वीं शताब्दी में बनी दो-भौमिक बैठक में लंबी दालान, कमरे और मध्य भाग में स्तंभों पर आधारित आकर्षक पत्थर की छतरी है। यहां क्षतिग्रस्त लखौरी ईंट की चिनाई, पत्थर, प्लास्टर और फर्श की मरम्मत होगी।
छतों का जीर्णोद्धार और वाटरप्रूफिंग, दरारों की स्टिचिंग, पत्थर की सतहों का रासायनिक उपचार तथा क्षतिग्रस्त दरवाजे-खिड़कियों को बदलने का काम होगा।
