लखनऊ विश्वविद्यालय के जंतु विज्ञान विभाग में अब कृषि में इस्तेमाल होने वाले रासायनिक कीटनाशकों के विकल्प पर शोध किया जाएगा। प्रदेश सरकार के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के तहत इस परियोजना के लिए चार लाख रुपये का बजट स्वीकृत किया गया है। शोध में लेडीबर्ड बीटल के प्राकृतिक रासायनिक संकेतों का उपयोग कर हानिकारक कीटों के नियंत्रण की संभावनाओं का अध्ययन होगा।

शोध का मुख्य फोकस लेडीबर्ड बीटल के “नॉन-कंजम्पटिव प्रभावों” पर रहेगा। लेडीबर्ड बीटल सामान्यतः माहू या लाही जैसे कीटों का शिकार करती है। वैज्ञानिक अब यह समझने का प्रयास करेंगे कि लेडीबर्ड के रासायनिक अवशेष और गंध एफिड्स के व्यवहार, भोजन ग्रहण करने की प्रवृत्ति, विकास और प्रजनन दर को किस तरह प्रभावित करते हैं।

 

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विशेषज्ञों के अनुसार, लेडीबर्ड की उपस्थिति से पैदा होने वाला “भय का मनोविज्ञान” हानिकारक कीटों को फसलों से दूर रखने और उनकी आबादी सीमित करने में प्रभावी हो सकता है। शुरुआती प्रयोगशाला अध्ययनों में लेडीबर्ड बीटल के अर्क के प्रभाव से एफिड्स की जीवित रहने की क्षमता में कमी और उनके व्यवहार में बदलाव देखने को मिला है।

वर्तमान में कृषि क्षेत्र में कीट नियंत्रण के लिए सिंथेटिक कीटनाशकों का व्यापक इस्तेमाल किया जाता है। इससे न केवल पर्यावरण प्रदूषण बढ़ता है, बल्कि कीटों में प्रतिरोधक क्षमता भी विकसित हो जाती है। विश्वविद्यालय की सहायक आचार्या तृप्ति यादव के नेतृत्व में होने वाला यह शोध समेकित कीट प्रबंधन (आईपीएम) के सिद्धांतों के अनुरूप स्थायी और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प विकसित करने की दिशा में अहम माना जा रहा है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह परियोजना भविष्य में बायो-पेस्टिसाइड के विकास के नए रास्ते खोलेगी, जिससे किसानों को कम लागत और सुरक्षित कीट नियंत्रण तकनीक मिल सकेगी। इससे फसलों की गुणवत्ता बेहतर होने के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा।

सहायक आचार्या एवं शोध सहायक, जंतु विज्ञान विभाग, तृप्ति यादव के अनुसार इस शोध का उद्देश्य लेडीबर्ड के रासायनिक अवशेषों और गंध के प्रभावों को समझना है। ये अवशेष एफिड्स के व्यवहार, भोजन ग्रहण करने की प्रवृत्ति, विकास और प्रजनन दर को प्रभावित करते हैं। लेडीबर्ड की उपस्थिति से उत्पन्न ‘भय का मनोविज्ञान’ कीटों की आबादी सीमित करने में प्रभावी हो सकता है।



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