Muzaffarnagar। शहर की ए टू जेड रोड की हालत देखकर एक सवाल जरूर उठता है—विकास आखिर हो कहां रहा है? सोशल मीडिया पर विकास के दावे, नेताओं की रीलें, उपलब्धियों का बखान और वाहवाही के पोस्ट अपनी जगह हैं, लेकिन ए टू जेड रोड पर पहुंचते ही तस्वीर कुछ और नजर आती है। यहां सड़क पर गहरे गड्ढे हैं, उनमें भरा पानी है और हर गुजरते वाहन के साथ हादसे का खतरा बना हुआ है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब सोशल मीडिया पर सब कुछ चमकता दिखाई देता है, तो सड़कों की यह बदहाली किसकी नजर से छूट रही है?
शहर की इस महत्वपूर्ण सड़क पर जगह-जगह बने गड्ढों में पानी जमा होने से उनकी गहराई का अंदाजा लगाना भी मुश्किल हो गया है। दोपहिया वाहन चालकों के लिए यह रास्ता खास तौर पर जोखिम भरा है। जरा-सी चूक हुई नहीं कि बाइक का संतुलन बिगड़ सकता है। पैदल चलने वालों की परेशानी अलग है। सड़क की हालत देखकर लगता है कि यहां वाहन चलाने के लिए सड़क से ज्यादा गड्ढों की पहचान जरूरी हो गई है।
सोशल मीडिया पर विकास की रीलें, सड़क पर गड्ढों का रियलिटी शो!
नगरपालिका से जुड़े जनप्रतिनिधियों और भाजपा नेताओं की सोशल मीडिया सक्रियता किसी से छिपी नहीं है। रीलों, तस्वीरों और अपनी उपलब्धियों के प्रचार के जरिए जनता तक संदेश पहुंचाने में खूब ऊर्जा दिखाई देती है। लेकिन शहर की सड़कें भी उसी ऊर्जा और प्राथमिकता की हकदार हैं। सवाल यह है कि कैमरे के सामने विकास की तस्वीर दिखाने वाले जिम्मेदार लोग जमीन पर मौजूद इन गड्ढों को कब देखेंगे?
जनता को विकास की कहानी केवल पोस्ट और वीडियो में नहीं, बल्कि अपने मोहल्ले की सड़क पर भी दिखाई देनी चाहिए। ए टू जेड रोड की मौजूदा हालत पर तंज कसते हुए कहा जा सकता है कि यहां विकास का दावा करने से पहले वाहन चालकों को यह बताना जरूरी है कि गड्ढे से बचकर निकलने का सही रास्ता कौन-सा है। आखिर सड़क पर चलने वाले नागरिकों को हर दिन जोखिम उठाना पड़े, तो प्रचार की चमक उनके किस काम की?
यह सवाल किसी एक पोस्ट या रील तक सीमित नहीं है। मुद्दा यह है कि शहर की बुनियादी समस्याओं पर कितना ध्यान दिया जा रहा है। अगर जिम्मेदार विभाग और जनप्रतिनिधि नियमित रूप से सड़कों का निरीक्षण करें और शिकायतों पर समय से कार्रवाई हो, तो शायद लोगों को हर बार बदहाल सड़क की तस्वीर दिखाकर अपनी परेशानी बताने की जरूरत ही न पड़े।
ए टू जेड, पारस, वसुंधरा और वेदांता कॉलोनी के लोगों की रोज की परीक्षा
ए टू जेड रोड केवल एक गली या किसी एक मोहल्ले का रास्ता नहीं है। यह ए टू जेड कॉलोनी, पारस कॉलोनी, वसुंधरा कॉलोनी और वेदांता कॉलोनी सहित आसपास की कई आवासीय बस्तियों को जोड़ती है। क्षेत्र में नई कॉलोनियां भी विकसित हो रही हैं। ऐसे में इस मार्ग का महत्व और बढ़ जाता है। यहां रहने वाले लोगों, नौकरी पर जाने वालों, कारोबारियों और रोजाना आने-जाने वाले नागरिकों को इसी सड़क से गुजरना पड़ता है।
लेकिन सड़क की बदहाली ने लोगों की रोजमर्रा की आवाजाही को मुश्किल बना दिया है। वाहन चालकों को गड्ढों से बचने के लिए बार-बार दिशा बदलनी पड़ती है। पानी से भरे गड्ढे दिखाई नहीं देते, इसलिए अनजान वाहन चालक अचानक संतुलन खो सकते हैं। ऐसे में सड़क की खराब हालत केवल असुविधा नहीं, बल्कि सड़क सुरक्षा से जुड़ा गंभीर सवाल भी है।
नई कॉलोनियों के विस्तार और बढ़ती आबादी के साथ बुनियादी सुविधाओं की जरूरत भी बढ़ती है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब इलाके में आवागमन करने वालों की संख्या बढ़ रही है, तो सड़क की मरम्मत और जलनिकासी की व्यवस्था उसी हिसाब से क्यों नहीं सुधर रही? विकास का असली पैमाना यही है कि नागरिकों को रोजमर्रा की जिंदगी में कितनी सुविधा मिल रही है।
पानी में छिपे गड्ढे, हर मोड़ पर हादसे का अंदेशा
सड़क पर गड्ढे होना अपने आप में परेशानी है, लेकिन उनमें पानी भर जाने से खतरा कई गुना बढ़ जाता है। वाहन चालक को यह पता ही नहीं चलता कि पानी के नीचे सड़क कितनी टूटी हुई है। जैसे ही पहिया गहरे गड्ढे में पड़ता है, बाइक या अन्य वाहन का संतुलन बिगड़ सकता है। दोपहिया वाहन चालकों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से खतरनाक है।
खराब सड़क के कारण वाहन चालकों को धीमी गति से चलना पड़ता है और रास्ता बदलने के लिए अचानक ब्रेक लगाने या दूसरी तरफ मुड़ने की नौबत भी आ सकती है। इससे यातायात प्रभावित होता है और दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। स्थानीय लोगों की मांग है कि सड़क की मरम्मत के साथ यह भी पता लगाया जाए कि पानी जमा क्यों हो रहा है। केवल गड्ढे भर देना पर्याप्त नहीं होगा, यदि कुछ समय बाद वही समस्या फिर सामने आ जाए।
नगरपालिका और जिम्मेदार विभाग कब लेंगे सुध?
स्थानीय लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस सड़क की जिम्मेदारी आखिर किस विभाग की है और मरम्मत की कार्रवाई कब होगी। सड़क की स्थिति का मौके पर निरीक्षण कराना, गड्ढों की पहचान करना, जलनिकासी की समस्या दूर करना और स्थायी मरम्मत की योजना बनाना संबंधित अधिकारियों की प्राथमिकता होनी चाहिए।
जनप्रतिनिधियों से भी अपेक्षा की जाती है कि वे सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने के साथ-साथ ऐसी स्थानीय समस्याओं को उठाएं और उनके समाधान के लिए संबंधित विभागों पर दबाव बनाएं। जनता को केवल यह बताना काफी नहीं कि विकास के लिए प्रयास किए जा रहे हैं; यह भी दिखाई देना चाहिए कि उन प्रयासों से सड़क, नाली और दूसरी बुनियादी सुविधाओं में क्या बदलाव आया है।
ए टू जेड रोड की हालत एक सीधा संदेश देती है—विकास की असली परीक्षा कैमरे के सामने नहीं, जमीन पर होती है। जनता को चमकदार पोस्टर या आत्मप्रशंसा से ज्यादा सुरक्षित सड़क चाहिए। यदि जिम्मेदार लोग इस समस्या पर समय रहते ध्यान दें, तो रोजाना इस रास्ते से गुजरने वाले लोगों को राहत मिल सकती है।
हादसे के बाद जागने से बेहतर है, अभी सड़क सुधार दी जाए
स्थानीय लोगों की मांग है कि संबंधित अधिकारी मौके पर पहुंचकर सड़क की वास्तविक स्थिति देखें और जल्द मरम्मत शुरू कराएं। गड्ढों को भरने के साथ जलनिकासी की समस्या का स्थायी समाधान भी जरूरी है, ताकि पानी जमा होने से सड़क दोबारा खराब न हो। सड़क सुरक्षा को देखते हुए तब तक जरूरी चेतावनी और अन्य अस्थायी उपाय भी किए जाने चाहिए।
शहर के नागरिकों को यह उम्मीद करना गलत नहीं कि जिस सड़क से वे रोज गुजरते हैं, वह कम से कम सुरक्षित तो हो। जनप्रतिनिधियों की लोकप्रियता सोशल मीडिया पर कितनी है, यह अलग बात है; उनकी असली जवाबदेही इस बात से तय होगी कि लोगों की समस्याओं का समाधान कितनी जल्दी और कितनी प्रभावी तरीके से होता है।
ए टू जेड रोड की हालत पर सवाल साफ है—रील और पोस्ट में विकास दिखाने के साथ जमीन पर भी काम नजर आना चाहिए। गहरे गड्ढों और जलभराव से जूझ रहे लोगों को प्रचार नहीं, सुरक्षित सड़क चाहिए। अब देखना यह है कि संबंधित विभाग और जनप्रतिनिधि इस समस्या पर कब कार्रवाई करते हैं।
