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अमर उजाला ब्यूरो

झांसी। दुर्गा प्रतिमा के विसर्जन के तरीके को लेकर बांधव समिति द्वारा की गई अनूठी पहल समाज के लिए एक मिसाल बनी हुई है। समिति की ओर आयोजन स्थल पर ही बनाए गए कुंड में प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। बाद में प्रतिमा की मिट्टी का उपयोग खेतों में किया जाता है।

बंगाली समाज की बांधव समिति की ओर से फूटा चौपड़ा स्थित कालीबाड़ी में पहली बार 1861 में शारदीय नवरात्र में दुर्गा प्रतिमा की स्थापना की गई थी। 164 सालों से यह परंपरा अनवरत रूप से बनी हुई है। शुरुआत से ही यहां स्थापित होने वाली प्रतिमा को दशहरे के दिन विसर्जन के लिए लक्ष्मीताल ले जाया जाता था। विसर्जन शोभा यात्रा में पहला नंबर बांधव समिति की प्रतिमा का होता था। ताल में गंदगी लगातार बढ़ती जा रही थी, ऐसे में समाज के लोगों को गंदगी के बीच प्रतिमा विसर्जन से मन खट्टा होने लगा था। ऐसे में उनकी ओर से साल 2015 में अनूठी पहल की गई।

कालीबाड़ी में ही प्रति विसर्जन के लिए 12 फीट व्यास का 14 फीट गहरा कुंड बनाया गया। यहां लिफ्ट के जरिये प्रतिमा को कुंड में उतारा जाता है। चार-पांच दिन में प्रतिमा की मिट्टी कुंड के पानी में घुल जाती है। इसे खेतों में पहुंचा दिया जाता है। इस बार भी बांधव समिति द्वारा इस परंपरा का पूरी शिद्दत के साथ निर्वहन किया गया। समिति की यह पहल अन्य सभी के लिए भी अनुकरणीय बनी हुई है। समिति के अजीत राय ने बताया कि मां की प्रतिमा को साफ पानी में पूरी पवित्रता के साथ विसर्जित कर सभी को बेहद सुकून मिलता है।



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