ताज ट्रेपेजियम जोन (टीटीजेड) में नए उद्योगों की स्थापना पर लगी रोक भले ही हट गई हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक बेहद सख्त त्रिस्तरीय निगरानी तंत्र लागू कर दिया है। अब टीटीजेड प्राधिकरण अकेले किसी भी उद्योग को मंजूरी नहीं दे सकेगा। सुप्रीम कोर्ट ने 410 एमएसएमई लगाने के संबंध में टीटीजेड प्राधिकरण की प्रत्येक बैठक में केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) और राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) के एक-एक विशेषज्ञ की उपस्थिति को अनिवार्य कर दिया है। दोनों में से किसी एक विशेषज्ञ ने भी उद्योग के गैर-प्रदूषणकारी होने पर आपत्ति जताई, तो वह उद्योग सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बिना किसी भी सूरत में नहीं लगेगा।
देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने बृहस्पतिवार को टीटीजेड में उद्योगों के नियमों से जुड़े मामले में यह आदेश पारित किया है। अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि पर्यावरण के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा। नई व्यवस्था के तहत बैठक से पहले ही टीटीजेड प्राधिकरण को सीईसी और नीरी द्वारा नामित विषय विशेषज्ञों के समक्ष प्रत्येक उद्योग के संबंध में पूरी पत्रावली प्रस्तुत करनी होगी। बिना दोनों विषय विशेषज्ञों की मौजूदगी के टीटीजेड प्राधिकरण की कोई भी बैठक वैध नहीं मानी जाएगी।
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पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए न्यायालय ने आदेश दिया है कि जिन मामलों में दोनों विशेषज्ञ और प्राधिकरण एकमत होकर किसी आवेदन को मंजूरी देते हैं, उन सभी अंतिम निर्णयों को अनिवार्य रूप से सीईसी की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड किया जाएगा। इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि कोई भी जनहितैषी व्यक्ति या संस्था यदि कोई आपत्ति या सुझाव देना चाहे, तो वह उसे दर्ज करा सके। जनता से प्राप्त इन सुझावों या आपत्तियों पर टीटीजेड प्राधिकरण को नीरी और सीईसी विशेषज्ञों के परामर्श से विचार करना जरूरी होगा।
इसके अलावा, न्यायिक समीक्षा का एक अहम विकल्प भी खुला रखा गया है। न्याय मित्र वरिष्ठ अधिवक्ता लिज मैथ्यूज को प्रत्येक अंतिम निर्णय की जानकारी पहले से दी जानी अनिवार्य की गई है। यदि न्याय मित्र को लगता है कि दोनों विशेषज्ञों की सहमति के बावजूद किसी फैसले की न्यायिक समीक्षा की आवश्यकता है, तो वे सीधे अदालत के समक्ष उपयुक्त आवेदन दायर कर सकती हैं।
सुनवाई के दौरान अदालत कक्ष में तीखी बहस भी देखने को मिली। आवेदक की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अपर्णा भट्ट ने टीटीजेड प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि प्राधिकरण अपना काम ठीक से नहीं कर रहा था और मनमाने ढंग से मंजूरियां दे रहा था, जिसके कारण ही अदालत को हस्तक्षेप कर प्रतिबंध लगाना पड़ा था। उन्होंने दलील दी कि अब लघु उद्योगों की आड़ में बड़े उद्योगों को लगाने का प्रयास किया जा रहा है।
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इस पर अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने आपत्ति जताते हुए कहा कि आवेदक को हर मामले में टांग नहीं अड़ानी चाहिए और यह आवेदन महज व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता से प्रेरित है। इस टिप्पणी पर अपर्णा भट्ट ने कड़ा एतराज जताते हुए अदालत से कहा कि आवेदक कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि एक जनहितैषी व्यक्ति है जिसने अदालत के ध्यान में एक गंभीर पर्यावरणीय मुद्दा उठाया है।
बता दें कि यह पूरा मामला एमसी मेहता मामले की शाखा के रूप में दर्ज मामले का हिस्सा है, जिसमें पर्यावरण संरक्षण और औद्योगिक विकास के बीच संतुलन बनाने की कवायद की जा रही है। ताजमहल से 10,400 वर्ग किमी. परिधि में फैले आगरा, मथुरा, फिरोजाबाद, हाथरस, एटा और भरतपुर क्षेत्र तक में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों के लिए आवेदन पर यह आदेश लागू होगा।
