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450 साल पहले मुगल काल में अपने हुनर से कारीगरों ने मुगलिया राजधानी में कालीन को चमकाया था। तब से पीढ़ी दर पीढ़ी यह हुनर आगे बढ़ता रहा, लेकिन अब नई पीढ़ी के कालीन बनाने से दूरी और कला का दाम न मिल पाने से कालीन के रंग फीके पड़ रहे हैं। रही सही कसर ईरान युद्ध ने पूरी कर दी है। अब कच्चा माल महंगा होने के साथ अमेरिका, यूरोप, आस्ट्रेलिया तक कालीन पहुंचाना मुश्किल हो रहा है। आगरा के परंपरागत हस्तनिर्मित कालीन उद्योग में मजदूरों की संख्या भी महज छह साल में 45 हजार से घटकर करीब 25 हजार तक रह गई है।
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आगरा की कालीन
– फोटो : अमर उजाला
कालीन के कारखानों में धागे भरे पड़े हैं, लेकिन ऑर्डर नहीं हैं। दिन-रात कालीन की बुनाई में व्यस्त रहने वाले ज्यादातर हाथ काम की तलाश में खाली हैं। आगरा में कालीन का कारोबार एक हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का है। करीब 6 हजार इकाइयां इससे जुड़ी हैं, लेकिन यह सभी कुटीर उद्योग के रूप में गांव-गांव में है। शहर में निर्यातकों के ऑर्डर पूरे करती हैं।
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आगरा की कालीन
– फोटो : अमर उजाला
पहले रूस-यूक्रेन युद्ध, फिर अमेरिकी टैरिफ और अब जनवरी से ईरान-अमेरिका युद्ध के कारण कच्चा माल महंगा हुआ, फिर कालीन की बढ़ी लागत के साथ शिपिंग का खर्च भी तीन से चार गुना हो गया। इससे नए ऑर्डर नहीं मिल रहे। कई कारखाने बंद होने से हजारों मजदूर जनवरी से अब तक काम छोड़ चुके हैं। फतेहाबाद रोड स्थित इकाई के कालीन निर्यातक संतोष माहेश्वरी ने बताया कि सरकार से मदद न मिली तो कालीन उद्योग तबाह हो जाएगा।
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आगरा की कालीन
– फोटो : अमर उजाला
हवाई में रखा है 17 वीं सदी का ताजमहल का कालीन
मुगल काल में ईरान से आगरा तक कालीन ने सफर किया, लेकिन उसके बाद आगरा में कालीन के कारीगरों ने दुनिया भर में अपनी छाप छोड़ी। ताजमहल के मुख्य मकबरे में रखा कालीन अब अमेरिका के हवाई में है। कालीन निर्यातक संजय कालरा ने बताया कि वह 15 साल पहले हवाई गए थे, तब ताजमहल के उस कालीन की खूबियों को वर्कशॉप में बताया गया था। अमेरिका, यूरोप में आगरा के हाथ के बने कालीन की मांग ज्यादा है, जबकि अन्य जगहों पर मशीनों का इस्तेमाल भी किया जा रहा है। यहां डिजाइन से लेकर फिनिशिंग तक सब काम हाथ से ही होता है।
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आगरा की कालीन
– फोटो : अमर उजाला
नए कारीगर नहीं सीख रहे काम
मुगलिया दौर से शुरू हुई इस कला के कारीगर फतेहपुर सीकरी, फतेहाबाद, शमशाबाद, सैयां, बिचपुरी, किरावली, अछनेरा और मिढ़ाकुर में हैं। कभी इनकी संख्या 80 हजार तक थी जो कोविड-19 के दौरान घटकर 45 हजार रह गई। अब महज 25 हजार कारीगर ही कालीन उद्योग से जुड़े हैं। कालीन निर्यातक राजेश जैन के मुताबिक मांग में कमी के साथ नए कारीगर काम नहीं सीख रहे हैं। इससे परंपरागत कला सिमट रही है। पहले पीढ़ी दर पीढ़ी यह कला आगे बढ़ रही थी।