उत्तर प्रदेश के शहरों में तमाम चश्माघरों में न तो आप्टोमेट्रिस्ट हैं और न ही उनके पंजीयन की व्यवस्था है। जिसे कोई काम नहीं मिला वो चश्माघर खोलकर आंखों की जांच में जुटा है। ऐसे लोग आंखों का विजन ठीक होने के बाद भी चश्मा पहना दे रहे हैं। जितनी जगह जांच कराइए, उतनी तरह की रिपोर्ट मिल रही है। चश्माघरों की हकीकत जानने के लिए राजधानी लखनऊ में पड़ताल की गई तो हालात चौंकाने वाले मिले।

केस-1: कैसरबाग चौराहे पर चश्माघर में प्रवेश करते ही काउंटर पर खड़ा व्यक्ति स्वागत करता है और सस्ता चश्मा बनाने का वादा। पहले से चश्मा प्रयोग करने और मशीन पर जांच कराने की बात कहने पर वह मशीन तक ले जाता है। मशीन पर मौजूद युवक से जब पूछा गया कि उसने ऑप्टोमेट्री की पढ़ाई कहाँ से की है तो वह खिसक लेता है। दूसरा युवक आया और खुद को एक निजी कॉलेज से डिप्लोमाधारी बताते हुए जांच की। दाहिनी आंख में सिलेंडर माइनस 0.50 बताया। बाई का 0.25 नंबर बताया।

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केस- 2: पत्रकारपुरम में चश्माघर में आंख की जांच कराने के बाद वहां मौजूद व्यक्ति फ्रेम दिखाना शुरू करता है। जैसे ही कहा कि अभी चश्मा नहीं बनवाना है तो वह 100 रुपये की रसीद पकड़ा देता है। बोलता है कि यह जांच कराने की फीस है। उसकी डिग्री के बारे में पूछा तो बताया है कि 25 साल का अनुभव है। डिग्रीवाले उसके सामने फेल हैं। जांच के बाद दाहिनी आंख का सिलेंडर 1.00 बताया।

गलत नंबर से बढ़ सकती है समस्या

नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. नयानी अमरीन का कहना है कि यदि आपको चश्मे की जरूरत नहीं है फिर भी बढ़े हुए नंबर का चश्मा पहन रहे हैं तो फोकसिंग मसल्स पर दबाव पड़ता है। हाई पॉवर से रेटिना पर असर पड़ता है। इससे आंखों की क्षमता घट जाती है। जब तक डॉक्टर न बताए तब तक नंबर वाले चश्मे नहीं पहनना चाहिए। यह भी सुनिश्चित करें कि आंखों की जांच ऑप्टोमेट्रिस्ट ही करें।

बढ़ रहे गलत नंबर का चश्मा लगाने वाले मरीज

यूपी की ऑप्टोमेट्री सोसायटी के अध्यक्ष ओमप्रकाश का कहना है कि किसी भी चश्माघर में जाएं तो यह सुनिश्चित कर लें कि वहां ऑप्टोमेट्रिस्ट ही जांच कर रहा है। बिना ऑप्टोमेट्रिस्ट की जांच के चश्मा बनवाना नुकसानदेह है। ओपीडी में आने वाले मरीजों में 15 से 25 फीसदी मरीज ऐसे मिलते हैं, जो कई साल से गलत नंबर का चश्मा पहन रहे हैं। इसकी वजह से उनकी आंखें प्रभावित होती हैं।



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