अलीगढ़ और आसपास के ब्रज क्षेत्र की नौरता-नौरती परंपरा धीरे-धीरे सिमट रही है। शहरों में इसके आयोजन कम दिखाई देते हैं। गांवों में भी गिनती के आंगनों में बेटियां इस लोकपरंपरा को सहेज रही हैं। बदलते समय के बीच नौरता के रंग आज भी गांव की बेटियों के हाथों में जिंदा हैं। रविवार को लोधा क्षेत्र के केशोपुर गांव की अंशिका, प्राची, गुंजन और राशि ने बताया कि उन्हें हर साल नौरता का इंतजार रहता है।
हालांकि, गांव में भी अब बहुत कम घर बचे हैं, जहां सहेलियां मिलकर नौरता-नौरती बनाती और परंपरा निभाती हैं। राशि कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ने के लिए शहर जाती हैं। वह बताती हैं कि जब अपनी कक्षा की दूसरी सहेलियों से नौरता की बातें साझा करती हैं, तो वे हैरानी से देखती हैं। उनकी प्रतिक्रिया से लगता है कि जैसे उनके लिए यह परंपरा किसी अनसुनी बात से कम नहीं है।
