आगरा में बहन के हत्या और भाभी पर जानलेवा हमले के दोषी को कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई है। कैदी को फिलहाल फिरोजाबाद जेल में रखा गया है। आगरा जिला जेल की बात करें तो यहां पर पूर्व में 35 कैदियों को फांसी दी जा चुकी हैं। वर्ष 1991 में आखिरी बार जुम्मन को फांसी दी गई थी। उसे भी बच्ची की हत्या के केस में दोषी पाया गया था। वह बुलंदशहर का रहने वाला था। वर्तमान में जेल का फांसी घर जर्जर है। यहां जल्लाद की भी तैनाती नहीं है।
मुगलों की राजधानी रहा आगरा ताजमहल, किला और बुलंद दरवाजा ही नहीं, जिला कारागार के लिए भी जाना जाता है। 12वें मुगल बादशाह मोहम्मद शाह गाजी के शासनकाल में हज आने-जाने वाले यात्रियों के आराम करने के लिए 1741 ई. में एक भवन का निर्माण कराया गया था। आजादी मिलने पर इसे जिला कारागार बना दिया गया। जिला कारागार में ही फांसी घर भी बनाया गया था। इसमें कई बंदियों को फांसी दी गई थी।
सबसे पहली फांसी 1951 में दी गई थी। 34 साल पहले जुम्मन को आखिरी बार फांसी दी गई थी। फांसी की सजा मिलने पर ज्यादातर बंदियों को केंद्रीय कारागार में रखा जाता है मगर, केंद्रीय कारागार में फांसी घर नहीं है। जिला जेल की बात करें तो यहां का फांसी घर जर्जर हालत में है। इसमें न कोई कमरा है और न ही दीवारें बनी हैं। सिर्फ फंदा बनाने के लिए लगाए गए एंगल ही बचे हैं। जेल के मुख्य गेट से करीब 600 मीटर की दूरी पर होने के कारण आसपास कोई जाता भी नहीं है। चारों तरफ झाड़ियां उग आई हैं।
