श्रीराम मंदिर की दान राशि और चढ़ावे में गबन के मामले में अब तक जो तथ्य सामने आए हैं, उनमें ट्रस्ट के कुछ बड़े लोगों और उनके शागिर्दों की भूमिका उजागर होती दिख रही है। ऐसे में उन पर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन हकीकत में इन असल जिम्मेदारों को बचाने का खेल चल रहा है। यही वजह है कि केस दर्ज नहीं कराया गया और एसआईटी गठित कर दी गई। सिर्फ छोटी कर्मचारियों पर ठीकरा फोड़ने की तैयारी चल रही है।


मंदिर की दान राशि और चढ़ावे को व्यवस्थित करना सुरक्षा व्यवस्था की तरह सबसे अहम कार्य होता है। मंदिर में करीब 36 मुख्य दानपात्र लगे हैं। रोजाना कुछ श्रद्धालु गुप्त दान में सोना-चांदी भी देते हैं। इसलिए इसमें ट्रस्ट के पदाधिकारियों की जिम्मेदारी तय की गई थी। सीसीटीवी से लैस कमरा भी था, जिससे कोई गड़बड़ी न हो सके। इसके बावजूद करोड़ों रुपये पार कर दिए गए। सोना-चांदी भी चोरों ने ठिकाने लगा दिया।

व्यवस्था में चंपत राय और ट्रस्ट के दो-तीन पदाधिकारियों के अलावा टिन्नू की भी भूमिका रहती थी। दान राशि की गिनती करवाने से लेकर उसे जमा कराने की पूरी प्रक्रिया में ये सभी शामिल रहते थे। इसके बावजूद करोड़ों रुपये का खेल हो गया। यही वजह है कि ये सभी सवालों के घेरे में हैं। जिनकी जिम्मेदारी दान राशि की निगरानी करना है, असल में इस गबन के जिम्मेदार भी वही हैं।



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